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Friday, August 30, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 5

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 5


 اَعُوْذُ بِاللّٰهِ مِنَ الشَّيْطٰنِ الرَّجِيْمِ    

“मैं पनाह मांगता हूँ अल्लाह की शैतान मरदूद से”

अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम में कई जगह बन्दों को शैतान के शर से पनाह मांगने का हुक्म दिया है, जैसा कि इरशाद फ़रमाया:

فَاِذَا قَرَاْتَ الْقُرْاٰنَ فَاسْتَعِذْ بِاللّٰهِ مِنَ الشَّيْطٰنِ الرَّجِيْمِ

“तो जब तू क़ुरआन पढ़े तो मरदूद शैतान से अल्लाह की पनाह तलब कर”।  [अन-नहल: 98] और फ़रमाया:

وَاِمَّا يَنْزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطٰنِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللّٰهِ ۭاِنَّهٗ سَمِيْعٌ عَلِيْمٌ

“और अगर कभी शैतान की तरफ़ से कोई उकसाहट तुझे उभार ही दे तो अल्लाह की पनाह तलब कर, बेशक वो सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है”। [अल-आराफ़: 200] और फ़रमाया:

وَ قُلْ رَّبِّ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ هَمَزٰتِ الشَّیٰطِیْنِۙ۝۹۷ وَ اَعُوْذُ بِكَ رَبِّ اَنْ یَّحْضُرُوْنِ۝۹۸

“और तू कह ऐ मेरे रब! मैं शैतानों की उकसाहटो से तेरी पनाह मांगता हूँ और ऐ मेरे रब! मैं इससे भी तेरी पनाह मांगता हूँ कि वो मेरे पास आ मौजूद हो”। [अल-मुमिनून: 97,98] 

इन आयतों में अल्लाह तआला ने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शैतान मरदूद से पनाह मांगने का हुक्म दिया है, क्यूंकि शैतान इंसान का ऐसा बुरा दुशमन है जो किसी भी भलाई और अहसान को नहीं मानता और हर वक़्त इसके ख़िलाफ़ साज़िश में लगा रहता है। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीसों से भी इसका सबूत मिलता है। सहीह हदीसों में शैतान मरदूद के शर से पनाह मांगने के कुछ जगहें निम्नलिखित हैं:

नमाज़ शुरू करते वक़्त शैतान के शर से पनाह तलब करना, जैसा कि सय्यदना अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब रात को क़याम करते तो नमाज़ शुरू करते हुए “अल्लाहु अकबर” कहते, फिर ये पढ़ते: { سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ وَتَبَارَكَ اسْمُكَ وَتَعَالَى جَدُّكَ وَلَا إِلَهَ غَيْرَكَ} “मैं पाकी बयान करता हूँ तेरी ऐ अल्लाह! तेरी ही हम्द व सना के साथ, तेरा नाम बहुत बरकत वाला है, तेरी शान बहुत बुलंद व बाला है और तेरे सिवा कोई और इबादत के लायक़ नहीं”। फिर आप तीन बार “ला इलाहा इल्लल्लाह” पढ़ते, फिर ये पढ़ते: {{أَعُوذُ بِاللَّهِ السَّمِيعِ الْعَلِيمِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ مِنْ هَمْزِهِ وَنَفْخِهِ}} “मैं अल्लाह की पनाह लेता हूँ जो सुनने वाला, जानने वाला है शैतान मरदूद से यानी उसके वस्वसे से और उसकी फूँक और उसके जादू से”। [मुसनद अहमद: 11479, अबू दावूद: 775, तिरमिज़ी: 242]

सय्यदना अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कहा करते थे:

{{اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ، وَهَمْزِهِ وَنَفْخِهِ وَنَفْثِهِ}} “ऐ अल्लाह! बेशक मैं तेरी पनाह लेता हूँ शैतान मरदूद से और उसके वस्वसे से, उसके तकब्बुर और उसके जादू से”। [इब्ने माजा: 808]

जारी है...................................

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Thursday, August 29, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 4

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 4

इमाम के पीछे भी सूरह फ़ातिहा ज़रूरी है, जैसा कि सय्यदना उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहू अन्हु रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि ने फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाई और आपके लिए क़ुरआन की तिलावत मुश्किल हो गई। जब नामाज़ से फ़ारिग़ हुए तो फ़रमाया: “शायद तुम अपने इमाम के पीछे क़िरात किया करते हो”? हमने कहा, हाँ, ऐ अल्लाह के रसूल! आपने फ़रमाया: “सिवाय फ़ातिहा के और कुछ न पढ़ा करो, क्यूंकि उस शख़्स की नमाज़ नहीं होती जो सूरह फ़ातिहा न पढ़ें। [तिरमिज़ी: 311, अबू दावूद: 823]

सय्यदना उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “मैं सोचता था कि क़ुरआन का पढ़ना मुझ पर दुशवार क्यों होता है (फिर मैंने जान लिया कि तुम्हारे पढ़ने की वजह से दुशवार हुआ) तो जब में जहरन पढ़ूं (जहरी नमाज़ में) तो क़ुरआन से सूरह फ़ातिहा के सिवा कुछ भी न पढो”। [अबू दावूद: 824]

सय्यदना अबू हुरैरा रज़ियाल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “जिस शख़्स ने नमाज़ पढ़ी और इसमें सुरह फ़ातिहा न पढ़ी तो वो (नमाज़) अधूरी है, अधूरी है, नामुकम्मल है”। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु से पूछा गया कि हम इमाम के पीछे होते हैं (तो क्या फिर भी पढ़ें)? तो अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु ने कहा, (हाँ)! तब तू इसको दिल में पढ़। [मुस्लिम: 878]

सय्यदना अनस रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा को नामज़ पढ़ाई, फ़ारिग़ होकर उनकी तरफ़ तवज्जो देकर पूछा: “क्या तुम अपनी नामाज़ में इमाम की क़िरात के दौरान में कुछ पढ़ते हो”? सब ख़ामोश रहे, तीन बार आपने उनसे यही पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया, जी हाँ! हम ऐसा करते हैं, आपने फ़रमाया: “ऐसा न किया करो, बल्कि तुम सिर्फ़ सुरह फ़ातिहा दिल में पढ़ लिया करो”। [इब्ने माजा: 1844, सुनन कुबरा लिलबैहक़ी: 2/166]

इन सहीह हदीसों से हर नमाज़ी के लिए हर नमाज़ में सूरह फ़ातिहा पढ़ना ज़रूरी है, नमाज़ी चाहे इमाम हो, या मुक़तदी, या अकेला, अगर वो सुरह फ़ातिहा नहीं पढ़ेगा तो उसकी नमाज़ नहीं होगी।

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Wednesday, August 28, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 3

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 3

तौरात व इंजील और क़ुरआन मजीद में सुरह फ़ातिहा जैसी कोई सूरत नहीं, जैसा कि सय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु रिवायत हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि ने उबई बिन कआब रज़ियल्लाहू अन्हु से फ़रमाया: “क्या तुम इस बात को पसंद करते हो कि मैं तुम्हें एक ऐसी सूरत सिखाऊँ कि इस जैसी सूरत न तौरात में नाज़िल हुई, न ज़बूर में, न इंजील में और न क़ुरआन में”। उबई बिन कआब रज़ियल्लाहू अन्हु ने कहा, हाँ! ऐ अल्लाह के रसूल! रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम इस दरवाज़े से न निकलने पाओगे कि वो तुम्हें सिखा दी जाएगी”। सय्यदना उबई रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं, फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझसे बात करने लगे, मैंने धीरे धीरे चल रहा था, इस डर से कि कहीं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बात ख़त्म करने से पहले (दरवाज़े पर) न पहुँच जायें। जब हम दरवाज़े के क़रीब पहुँचे तो मैंने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल! वो कौन सी सूरत है जिसके बताने का आपने मुझसे वादा किया था? रसूलुल्लाह सल्लालाल्हू अलैहि ने फ़रमाया: “तुम नमाज़ में क्या पढ़ते हो”? सय्यदना उबई रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं, मैंने सूरह फ़ातिहा पढ़ कर सुनाई। रसूलुल्लाह सल्लाल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “उस ज़ात की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है! अल्लाह ने इस सूरत की जैसी न तौरात में कोई सूरत नाज़िल की, न इंजील में, न ज़बूर में और न फ़ुरक़ान (क़ुरआन) में और बेशक वो सबअ मसानी है”। [मुसनद अहमद: 9364, तिरमिज़ी: 2875]

हर नमाज़ की हर रकात में सूरह फ़ातिहा पढ़ना वाजिब है, जैसा कि सय्यदना उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि ने फ़रमाया: “जो शख़्स सुरह फ़ातिहा न पढ़े उसकी नमाज़ ही नहीं होती”। [बुख़ारी: 756, मुस्लिम: 874]

हर रकात में सूरह फ़ातिहा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि का तरीक़ा था, जैसा सय्यदना अबू क़तादा रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं, बेशक नबी सल्लल्लाहु अलैहि ज़ुहर की पहली दो रकातों में सूरह फ़ातिहा और दो सूरतें पढ़ते थे और आख़िरी दो में सिर्फ़ सूरह फ़ातिहा पढ़ते थे। [बुख़ारी: 776]

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Tuesday, August 27, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 2

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 2


इस सूरह करीमा के पढ़ कर फूँकने से यानी दम से साँप आदि के ज़हर का असर अल्लाह के हुक्म से ख़त्म हो जाता है, जैसा कि सय्यदना अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाह अन्हु बयान करते हैं कि अरब के एक क़बीले के पास से कुछ सहाबा का गुज़र हुआ, क़बीले वालों ने सहाबा की मेहमान नवाज़ी से इन्कार कर दिया, इसी दौरान में उनके सरदार को बिच्छू (या साँप) ने काट लिया, क़बीले वालों से सहाबा से कहा, तुम्हारे पास कोई दवा हो, या तुम लोगों में कोई दम झाड़ करने वाला शख़्स हो? सहाबा ने कहा, तुमने हमारी मेहमान नवाज़ी नहीं की, लिहाज़ा जब तक तुम हमें कुछ माल न दोगे हम इलाज नहीं करेंगे। इस पर उन लोगों ने कुछ बकरियाँ देने का वादा किया तो एक शख़्स ने सुरह फ़ातिहा पढ़नी शुरू की और साथ साथ वो थूक जमा करता और (काटने वाली जगह पर) थुतकारता जाता, तो इस तरह सरदार अच्छा हो गया, वो बकरियाँ ले कर आये तो कुछ सहाबा ने कहा, हम बकरियाँ नहीं लेंगे, जब तक कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछ न लें, वापसी पर उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि से पूछा, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि इस पर मुस्करा दिये और इस शख़्स से फ़रमाया: “तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि ये सूरत रुक़्या (दम) है? (तुमने ठीक किया) ये बकरियाँ ले लो और अपने साथ मेरा भी हिस्सा निकालो”। [बुख़ारी: 5736, मुस्लिम: 5733]

इस हदीस से मालूम हुआ कि सुरह फ़ातिहा रुक़्या है, इसके ज़रिये से दम करके इलाज किया जा सकता है और वाज़ेह हुआ कि ज़रुरत के वक़्त क़ुरआन मजीद पर उजरत (मेहनताना) लेना जायज़ है। सहाबा किराम रज़ियल्लाहू अन्हुम ने उजरत इसलिये मांगी थीं क्यूंकि बस्ती वालों ने उनकी मेहमान नवाज़ी से इन्कार कर दिया था, लिहाज़ा जायज़ दम करना और इसकी उजरत लेना जायज़ है लेकिन इसे एक हमेशा के लिए पेशा बना लेना साबित नहीं, फिर बिना मतलब वाले अलफ़ाज़ से तावीज़ लिखना, उन्हें पानी में घोल कर पिलाना, गले में लटकाना या किसी दूसरी जगह बाँधना, तो ऐसे काम शरअन हराम हैं।

सुरह फ़ातिहा ही नमाज़ है, जैसा कि सय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ये फ़रमाते हुए सुना, आप फ़रमा रहे थे: “अल्लाह तआला फ़रमाता है कि मैंने नमाज़ को अपने और अपने बन्दे के बीच दो हिस्सों में बाँट दिया है और मेरे बन्दे के लिए वो कुछ है जिसका वो सवाल करे, बन्दा जब कहता है: { اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِيْنَ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, मेरे बन्दे ने मेरी तारीफ़ की है और जब कहता है: { الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है मेरे बन्दे ने मेरी सना की है और जब कहता है: { مٰلِكِ يَوْمِ الدِّيْنِ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, मेरे बन्दे ने मेरी बुज़ुर्गी बयान की और यूँ भी फ़रमाता है कि मेरे बन्दे ने (अपना मामला) मेरे सुपुर्द कर दिया। बन्दा जब कहता है: { اِيَّاكَ نَعْبُدُ وَاِيَّاكَ نَسْتَعِيْنُ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, ये मेरे और मेरे बन्दे के बीच है और मेरे बन्दे के लिए वो कुछ है जिसका वो सवाल करे और जब बन्दा ये कहता है:

}  اِھْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَـقِيْمَ Ĉ۝ۙصِرَاطَ الَّذِيْنَ اَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ ۹ غَيْرِ الْمَغْضُوْبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّاۗلِّيْنَ{

तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, ये मेरे बन्दे के लिए है और मेरे बन्दे के लिए वो कुछ है जिसका वो सवाल करे”। [मुस्लिम: 878]

जारी है...................................


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https://authenticmessages.blogspot.com/2024/08/tafseer-dawat-ul-quran-hindi_27.html

Monday, August 26, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 1

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 1


सुरह फ़ातिहा के शाने नुज़ूल के बारे में सय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हुमा बयान करते हैं, एक दिन जिब्रील अलैहिस्सलाम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास बैठे हुए थे, उन्होंने अपने ऊपर की तरफ़ से बड़े ज़ोर से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनी, उन्होंने अपना सर उठाया और फ़रमाया: “आज आसमान का वो दरवाज़ा खुला है, जो इससे पहले कभी नही खुला था और इससे एक फ़रिश्ता उतरा है”। फिर फ़रमाया: “इस दरवाज़े से ये फ़रिश्ता ज़मीन पर उतरा है, ये आज के दिन से पहले कभी नहीं उतरा”। इस फ़रिश्ते ने (रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को) सलाम किया और कहा: “आपको इन दो नूरों की ख़ुशख़बरी हो जो आपको इनायत हुए हैं ये आप से पहले किसी नबी को अता नहीं हुए, इनमें से एक सुरह फ़ातिहा है और दूसरा नूर सुरह बक़रह की आख़िरी आयतें। आप जब भी इन दोनों में से कोई हर्फ़ तिलावत करेंगें तो आपको मांगी हुई चीज़ ज़रूर अता कर दी जाएगी”। [मुस्लिम: 1877]

सुरह फ़ातिहा क़ुरआन मजीद की सबसे ज़्यादा अज़मत वाली सूरत है, जैसा कि सय्यदना अबू सईद बिन मुअल्ला रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं कि मैं मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहा थे कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे बुलाया, मैं उसी वक़्त हाज़िर न हुआ (बल्कि नमाज़ पढ़ कर गया) और कहा कि या रसूलुल्लाह! मैं नमाज़ पढ़ रहा था (इस वजह से देर हुई) तो आपने फ़रमाया: “क्या अल्लाह ने ये नहीं फ़रमाया: { اسْتَجِيْبُوْا لِلّٰهِ وَلِلرَّسُوْلِ اِذَا دَعَاكُمْ } तुम अल्ल्लाह की और रसूल की दावत क़ुबूल करो, जब वो तुम्हें बुलाएं”। [अनफ़ाल: 24] फिर मुझसे फ़रमाया: तेरे मस्जिद से बाहर जाने से पहले तुझे क़ुरआन की एक ऐसी सूरत बताऊंगा जो (अज्र व सवाब में) सारी सूरतों से बढ़ कर है”। फिर आपने मेरा हाथ पकड़ लिया, जब आपने बाहर आने का इरादा किया तो मैंने कहा कि या रसूलुल्लाह! क्या आपने ये नहीं फ़रमाया था कि मैं तुमको एक सूरत बतलाऊँगा जो क़ुरआन की सब सूरतों से बढ़ कर है? आपने फ़रमाया: “वो सूरत { اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِيْنَ} है। यही सबअ मसानी (यानी सात आयतें हैं जो बार बार दोहराई जाती हैं) और क़ुरआन ए अज़ीम है जो मुझे दिया गया है”। [बुख़ारी: 4474]                                


जारी है...................................


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Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 8

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم● 🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃 📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒 ✒️ लेख़क: अ...