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Thursday, April 1, 2021

ईमान क्या है? (Imaan Kya Hai?)

 

ईमान क्या है?

शेख़ ग़ुलाम मुस्तफ़ा ज़हीर अमनपुरी हफ़िज़ल्लाह

क़ुरआने करीम और हदीसे नबविया में लफ़्ज़ ईमान कई मर्तबा आया है क्यूंकि यही दीन की असल और मज़हब की असास है, इसी की बदौलत लोग़ गुमराही के अंधेरों से हक़ की रौशनी की तरफ़ राह पाते हैं, इसी से ख़ुशबख़्तों और बदबख़्तों में फ़र्क़ होता है, और दोस्त और दुश्मन की तमीज़ होती है, पूरा दीन इसी के ताबेअ है, लिहाज़ा हर मुसलमान के लिए हक़ीक़ते ईमान को जानना बहुत ज़रूरी है

क़ुरआन व सुन्नत में हक़ीक़ते ईमान का काफ़ी व शाफ़ी बयान है, इससे हट कर किसी और की वज़ाहत की ज़रुरत नहीं।

हमारे असलाफ़, सहाबा व ताबईन किसी भी वज़ाहत के सिलसिले में रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फ़रमानों से अपना दामन भर लेते थे, क्यूंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ही शारेह व मुफ़स्सिरे क़ुरआन हैं।

आइये पहले तो ईमान को जानने की अहमियत का अंदाजा लगायें।

हाफ़िज़ इब्ने रजब रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

هَذِهِ الْمَسَائِلُ - أَعْنِي مَسَائِلَ الْإِسْلَامِ وَالْإِيمَانِ وَالْكُفْرِ وَالنِّفَاقِ - مَسَائِلُ عَظِيمَةٌ جِدًّا، فَإِنَّ اللَّهَ عَلَّقَ بِهَذِهِ الْأَسْمَاءِ السَّعَادَةَ وَالشَّقَاوَةَ، وَاسْتِحْقَاقَ الْجَنَّةِ وَالنَّارِ، وَالِاخْتِلَافَ فِي مُسَمَّيَاتِهَا أَوَّلَ اخْتِلَافٍ وَقَعَ فِي هَذِهِ الْأُمَّةِ، وَهُوَ خِلَافُ الْخَوَارِجِ لِلصَّحَابَةِ، حَيْثُ أَخْرَجُوا عُصَاةَ الْمُوَحِّدِينَ مِنَ الْإِسْلَامِ بِالْكُلِّيَّةِ، وَأَدْخَلُوهُمْ فِي دَائِرَةِ الْكُفْرِ، وَعَامَلُوهُمْ مُعَامَلَةَ الْكَفَّارِ، وَاسْتَحَلُّوا بِذَلِكَ دِمَاءَ الْمُسْلِمِينَ وَأَمْوَالَهُمْ، ثُمَّ حَدَثَ بَعْدَهُمْ خِلَافُ الْمُعْتَزِلَةِ وَقَوْلُهُمْ بِالْمَنْزِلَةِ بَيْنَ الْمَنْزِلَتَيْنِ، ثُمَّ حَدَثَ خِلَافُ الْمُرْجِئَةِ، وَقَوْلُهُمْإِنَّ الْفَاسِقَ مُؤْمِنٌ كَامِلُ الْإِيمَانِ

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इस्लाम, ईमान, कुफ़्र और निफ़ाक़ बहुत बड़े बड़े मसाइल हैं, क्यूंकि अल्लाह तआला ने इन्ही अल्फ़ाज़ के साथ सआदत व बदबख़्ती और जन्नत व जहन्नम का नाता जोड़ा है, इनके हक़ाइक़ में इख़्तिलाफ़ ही इस उम्मत का सबसे पहला इख़्तिलाफ़ था, वो इस तरह कि ख़ारजियों ने सहाबा ए किराम की मुख़ालिफ़त की, तो गुनाहगार मोहिदों को उन्होंने बिल्कुल इस्लाम से ख़ारिज करके दायरे कुफ़्र में दाख़िल कर दिया और उनसे काफ़िरों का सा सुलूक किया, यूं उन्होंने मुसलमानों के माल व जान को हलाल क़रार दिया, फिर मोअतज़ला का फ़ितना उठा, उन्होंने की अजीब व ग़रीब मन्तिक़ पेश की, इसके बाद मुरजिआ ने जन्म लिया और कहा कि फ़ासिक़ शख़्स भी कामिलुल ईमान मोमिन है (जामिउल उलूम वल हिकम  पेज नंबर 27)

सहाबा व ताबईने किराम पर मुशतमिल असलाफ़े उम्मत का इजमाई फ़ैसला यह है कि ईमान (क़ौल व अमल) (ज़बान व दिल के) क़ौल और (दिल व जिस्म के हिस्से के) अमल का नाम है बहुत सारे आइमा किराम से यही मनक़ूल है

हाफ़िज़ बग़वी फ़रमाते हैं:

اتَّفَقَتِ الصَّحَابَةُ وَالتَّابِعُونَ، فَمَنْ بَعْدَهُمْ مِنْ عُلَمَاءِ السُّنَّةِ عَلَى أَنَّ الأَعْمَالَ مِنَ الإِيمَانِ........... إِنَّ الإِيمَانَ قَوْلٌ، وَعَمَلٌ، وَعَقِيدَةٌ

सहाबा, ताबईन और बाद के मुहद्दिसीन का इजमाई व इत्तिफ़ाक़ी फ़ैसला है कि आमाल ईमान में दाख़िल हैं...........उनका कहना है कि ईमान इक़रार, अमल और तसदीक़ का नाम है (शरह अस-सुन्नाह:1/38)

हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

إِنَّ الْإِيمَانَ لَيْسَ بِالتَّحَلِّي وَلَا بِالتَّمَنِّي، إِنَّمَا الْإِيمَانُ مَا وَقَرَ فِي الْقَلْبِ، وَصَدَّقَهُ الْعَمَلُ

ईमान ज़ाहिरी सजावट या बातिनी आरज़ू का नाम नहीं, बल्कि ईमान वो है, जो दिल में जगह पकड़े और अमल उसकी तसदीक़ करे (मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा;13/504, इसकी सनद हसन है)

ख़ालिद बिन शौज़ब रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं कि मैंने फ़रक़द संजी को देखा, वो ऊन का जुब्बा पहने हुए थे, हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह ने उसे जुब्बे से पकड़ा और दो या तीन बार फ़रमाया: इब्ने फ़रक़द!

إِنَّ التَّقْوَى لَيْسَ فِي هَذَا الْكِسَاءِ إِنَّمَا التَّقْوَى مَا وَقَرَ فِي الْقَلْبِ وَصَدَّقَهُ الْعَمَلُ وَالْفِعْلُ

तक़वा (ईमान) इस चादर में नहीं, बल्कि तक़वा (ईमान) वो है, जो दिल में पुख़्ता हो जाए और (ज़बान व दिल का) अमल (तसदीक़ व इक़रार) और (जिस्म के हिस्से का) फ़ेल उसकी तसदीक़ करे(अज़-ज़वाइद लिअब्दिल्लाह अलज़-ज़ुहद लिअबी अहमद बिन हंबल: 1522, इसकी सनद हसन है)

ईमान, इस्लाम और दोनों का आपस में तआल्लुक़:

किताब व सुन्नत की नुसूस में ईमान व इस्लाम का लफ्ज़ कभी तो इकठ्ठा आता है और कभी उनको अलग अलग ज़िक्र किया गया, सवाल पैदा होता है कि क्या दोनों का एक ही मतलब है या यह दोनों अलग अलग चीज़ें हैं?

इसमें अहले इल्म का इख़्तिलाफ़ है, याद रहे कि इस मसअले में इख़्तिलाफ़ सहाबा व ताबईन के बाद शरू हुआ, उनसे मनक़ूल आसार बताते हैं कि उनका मुत्तफ़क़ा फ़ैसला यही था कि यह दोनों अलग अलग चीज़ें हैं यानी इस्लाम और है और ईमान और।

शेख़ुल इस्लाम इब्ने तैयमिया रहमतुल्लाह अलैह मुहम्मद बिन नस्र मरवज़ी रहमतुल्लाह का रद्द करते हुए फ़रमाते हैं, जोकि दोनों को एक समझते थे:

هو لم ينقل عن أحد من الصحابة والتابعين لهم بإحسان ولا أئمة الإسلام المشهورين أنه قالمسمى الإسلام هو مسمى الإيمان كما نصر، بل ولا عرفت أنا أحدًا قال ذلك من السلف

वो (मुहम्मद इब्न नस्र रहमतुल्लाह अलैह) अपने इख़्तियार किये हुए मज़हब पर सहाबा व ताबईन या इस्लाम के मशहूर आइमा किराम में से किसी एक का भी क़ौल नक़ल नहीं कर पाए कि उसने इस्लाम और ईमान की हक़ीक़त को एक क़रार दिया हो, बल्कि मेरे इल्म में असलाफ़ में से किसी एक ने भी यह बात नहीं कही(अल-ईमान, पेज नंबर 349)

ईमान व इस्लाम में फ़र्क़ तो सहाबा व ताबईन का इजमाई क़ौल है, ज़्यादातर अहले सुन्नत वल जमात इसी पर क़ायम हैं

जबकि उनको एक कहने वालों में इमाम बुख़ारी, इमाम मुहम्मद बिन नस्र मरवज़ी, इमाम इब्ने मुंदाह और हाफ़िज़ इब्ने अब्दुल बर्र रहमतुल्लाह अलैहिम आदि शामिल हैं।

दलाइल:

ईमान व इस्लाम को दो अलग अलग हक़ाइक़ कहने वालों के पास किताब व सुन्नत से दलाइल हैं, कुछ एक मुलाहिज़ा फ़रमाएं:

फ़रमाने बारी तआला है:

قَالَتِ الْاَعْرَابُ اٰمَنَّا١ؕ قُلْ لَّمْ تُؤْمِنُوْا وَ لٰكِنْ قُوْلُوْۤا اَسْلَمْنَا وَ لَمَّا یَدْخُلِ الْاِیْمَانُ فِیْ قُلُوْبِكُمْ١ؕ وَ اِنْ تُطِیْعُوا اللّٰهَ وَ رَسُوْلَهٗ لَا یَلِتْكُمْ مِّنْ اَعْمَالِكُمْ شَیْـًٔا١ؕ اِنَّ اللّٰهَ غَفُوْرٌ رَّحِیْمٌ۝۱۴

ऐराबियों ने कहा कि हम ईमान ले आये हैं, (ऐ नबी!) आप कह दीजिये कि तुम ईमान नहीं लाये, बल्कि कहो कि हम इस्लाम ले आयें और अभी तक ईमान तुम्हारे दिलों में दाख़िल नहीं हुआ(अल-हुजुरात:14)

हाफ़िज़ इब्ने कसीर रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

اسْتُفِيدَ مِنْ هَذِهِ الْآيَةِ الْكَرِيمَةِأَنَّ الْإِيمَانَ أَخَصُّ مِنَ الْإِسْلَامِ كَمَا هُوَ مَذْهَبُ أَهْلِ السُّنَّةِ وَالْجَمَاعَةِ

इस आयते करीमा से मालूम हुआ कि ईमान, इस्लाम से ज़्यादा ख़ास चीज़ है, यही अहले सुन्नत वल जमात का मज़हब है (तफ़सीर इब्ने कसीर:7/327)

सय्यदना साद बिन अबी वक्क़ास रज़ियाल्लाहू अन्हु बयान करते हैं:

أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَعْطَى رَهْطًا وَسَعْدٌ جَالِسٌ، فَتَرَكَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ رَجُلًا هُوَ أَعْجَبُهُمْ إِلَيَّ، فَقُلْتُيَا رَسُولَ اللَّهِ مَا لَكَ عَنْ فُلاَنٍ فَوَاللَّهِ إِنِّي لَأَرَاهُ مُؤْمِنًا، فَقَالَ: «أَوْ مُسْلِمًا» فَسَكَتُّ قَلِيلًا، ثُمَّ غَلَبَنِي مَا أَعْلَمُ مِنْهُ، فَعُدْتُ لِمَقَالَتِي، فَقُلْتُمَا لَكَ عَنْ فُلاَنٍ؟ فَوَاللَّهِ إِنِّي لَأَرَاهُ مُؤْمِنًا، فَقَالَ: «أَوْ مُسْلِمًا». ثُمَّ غَلَبَنِي مَا أَعْلَمُ مِنْهُ فَعُدْتُ لِمَقَالَتِي، وَعَادَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، ثُمَّ قَالَ: «يَا سَعْدُ إِنِّي لَأُعْطِي الرَّجُلَ، وَغَيْرُهُ أَحَبُّ إِلَيَّ مِنْهُ، خَشْيَةَ أَنْ يَكُبَّهُ اللَّهُ فِي النَّارِ

रसूलुल्लाह सल्लालाल्हू अलैहि वसल्लम ने लोगों में (माले ग़नीमत) बाँटा एक आदमी को न दिया, वो मुझे अच्छा लगता था, मैंने कहा: अल्लाह के रसूल! आपने फ़ुलाँ को नहीं दिया, जबकि मैं उसे मोमिन ख़याल करता हूँ, आप सल्लालाल्हू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: मोमिन या मुसलमान। मैं कुछ देर ख़ामोश रहा, फिर पहली बात दोहराई: आपने फ़ुलाँ को नहीं दिया, जबकि मैं उसे मोमिन ख़याल करता हूँ। आप सल्लालाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: मोमिन या मुसलमान। मैंने फिर पहली बात दोहराई, रसूलुल्लाह सल्लालाहू अलैहि वसल्लम ने भी पहला सा ही जवाब दिया, फिर फ़रमाया: साद! मैं एक शख़्स को माले ग़नीमत देता हूँ, जबकि दूसरा शख़्स मुझे इससे भी ज़्यादा प्यारा होता है, यह इस डर से कहीं ऐसा न हो कि (वो अपनी कमज़ोरी की वजह से इस्लाम से हट जाये और) अल्लाह तआला उसे औंधे मुंह दोज़ख़ में डाल दे(सही बुख़ारी: 27, सहीह मुस्लिम: 150)

इस मज़हब की एक मशहूर दलील हदीसे जिब्रील भी है कि जब जिब्रील अलैहिस्सलाम ने नबी करीम सल्लालाहू अलैहि वसल्लम से इस्लाम, ईमान और इहसान के बारे में अलग अलग सवाल किये।

शेख़ुल इस्लाम इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

قد فرق النبي صلى الله عليه وسلم في حديث جبريل عليه السلام بين مسمى الإسلام ومسمى الإيمان ومسمىالإحسان

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हदीसे जिब्रील में इस्लाम, ईमान और इहसान को अलग अलग क़रार दिया है(अल-ईमान, पेज नंबर 1)

इन दलाइल से साबित होता है कि ईमान व इस्लाम दो अलग अलग चीज़ें हैं और दोनों का अपना अपना मतलब है, लिहाज़ा इस्लाम ज़ाहिरी आमाल का नाम है, जबकि ईमान बातिनी आमाल का नाम है

कुछ अहले इल्म ने इस फ़र्क़ की बड़ी अच्छी वज़ाहत की है, वो यह कि दोनों में कभी कभी फ़र्क़ होता है और कभी कभी फ़र्क़ नहीं होता, लिहाज़ा जब यह दोनों अल्फ़ाज़ अलग अलग इस्तेमाल हों, तो दोनों का एक ही मतलब होता है और जब इकठ्ठे हों, तो अलग अलग मतलब देते हैं, जब दोनों इकठ्ठे हों, तो इस्लाम की तफ़सीर ज़ाहिरी आमाल और ईमान की बातिनी आमाल से होगी, जैसा कि हदीसे जिब्रील में है।

इसके विपरीत जब वो अलग अलग आयें, तो एक दुसरे को भी शामिल होते हैं, जैसा कि वफ़दे अब्दुल क़ैस वाली हदीस में नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ईमान की तफ़सीर ज़ाहिरी आमाल से कर दी, और फ़रमाने बारी तआला {اِنَّ الدِّیْنَ عِنْدَ اللّٰهِ الْاِسْلَامُ١} यक़ीनन अल्लाह तआला के नज़दीक दीन सिर्फ़ इस्लाम ही है(आले इमरान:19) भी इस पर शाहिद है

ख़ुलासा यह हुआ कि जब ईमान व इस्लाम एक जगह हों, तो अलग अलग मतलब देते हैं और जब अलग अलग इस्तेमाल हों, तो उनका मतलब एक होता है, हाफ़िज़ ख़त्ताबी, हाफ़िज़ बग़वी, हाफ़िज़ इब्नुस सलाह, अल्लामा इनबे तैमिया, हाफ़िज़ इब्ने रजब आदि रहमतुल्लाह अलैहिम इसी तफ़सील के क़ाइल हैं।

हाफ़िज़ ख़त्ताबी रहमतुल्लाह अलैह साद रज़ियल्लाहू अन्हु की ज़िक्र की हुई हदीस की शरह में लिखते हैं: इस हदीस का ज़ाहिर ईमान और इस्लाम में फ़र्क़ को ज़रूरी क़रार देता है, इस मसअले में अहले इल्म ने लम्बी बहस की है और बड़ी बड़ी किताबें लिख दी हैं, यहाँ इख़्तिसार की वजह से जो बात बयान करना ज़रूरी है, वो यह है कि ईमान और इस्लाम कभी कभी एक ही होते हैं, लिहाज़ा मुस्लिम को मोमिन कह दिया जाता है और मोमिन को मुस्लिम। ज़्यादातर यह अलग अलग होते हैं, लिहाज़ा हर मुस्लिम को मोमिन नही कहा जा सकता, जबकि हर मोमिन को मुस्लिम कहना दुरुस्त होता है, इन दोनों को एक मतलब में उस वक़्त इस्तेमाल किया जात है, जहाँ ज़ाहिर व बातिन बराबर हों, अगर ऐसा न हो, तो यह अलग अलग हो जाते हैं, इस मौक़े पर मुस्लिम का मतलब होगा: वो ज़ाहिरी तौर पर इत्तिबा करने वाला हो गया है, इस हदीस में औ मुस्लिमा इसी मतलब में है। फ़रमाने बारी तआला:

قَالَتِ الْاَعْرَابُ اٰمَنَّا١ؕ قُلْ لَّمْ تُؤْمِنُوْا وَ لٰكِنْ قُوْلُوْۤا اَسْلَمْنَا وَ لَمَّا یَدْخُلِ الْاِیْمَانُ فِیْ قُلُوْبِكُمْ

ऐराबियों ने कहा कि हम ईमान ले आये हैं, (ऐ नबी!) आप कह दीजिये, तुम ईमान नहीं लाये, बल्कि कहो कि हम मुसलमान हो गए(अल-हुजुरात:14) भी यही बताता है कि इस्लाम से मुराद ज़ाहिरी इताअत है, अरबी शायर उमय्या बिन अबी सल्त के इस शेअर से भी यही मालूम होता है:

أسلمت وجهي لمن أسلمتْ .... له الريح تحمل مزناً ثقالا

मेरा चेहरा उस ज़ात के लिए मुतीअ हो गया, जिसके लिय्हे भारी बादल उठाये हुए हुआ मुतीअ है(ऐलामुल हदीस1/160-161)

शेख़ुल इस्लाम इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं:

तहक़ीक़ बात यही है, जिसे नबी अकरम सल्लालाल्हू अलैहि वसल्लम ने बयान कर दिया है, जब इस्लाम और ईमान के बारे में पुछा गया, तो आपने इस्लाम की तफ़सीर ज़ाहिर आमाल और ईमान के अरकान पाँच से की, हम भी जब ईमान व इस्लाम का इकठ्ठा ज़िक्र करें, तो वही  जवाब देना हमारे लिए ज़रूरी है, जो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दिया, अलबत्ता जब इस्लाम का नाम अकेला लिया जाए, तो इसमें बिला-शुबा ईमान भी दाख़िल हो जाता है, यही बात हक़ है, और मुसलमान को क्या मोमिन भी कहा जा सकता है? इस बारे में बहस हो चुकी है। (अल-ईमान पेज नंबर 246)

हाफ़िज़ इब्ने रजब रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं:

हमारी ज़िक्र हुई तफ़सील से इख़्तिलाफ़ ख़त्म हो जाता है, यानी जब इस्लाम और ईमान में से हर एक का अलग अलग ज़िक्र किया जाए, तो उस वक़्त उनमें कोई फ़र्क़ नहीं होगा, अगर दोनों को इकठ्ठा ज़िक्र किया जाए, तो दोनों में फ़र्क़ होगा, वो यह कि ईमान दिल की तसदीक़, इक़रार और मारिफ़त का नाम है, जबकि इस्लाम बन्दे की अल्लाह के सामने ज़ाहिरी इताअत, ख़ुशूअ वो ख़ुज़ूअ और इनकिसारी को कहा जाता है........लिहाज़ा ईमान से मुराद तसदीक़ क़लबी और इस्लाम से मुराद ज़ाहिरी अमल है। (जामिउल उलूम वल हिकम, पेज नंबर 25)

हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

الْإِسْلَامُ وَمَا الْإِسْلَامُ؟ قَالَ:  الْإِسْلَامُ السِّرُّ وَالْعَلَانِيَةُ فِيهِ سَوَاءٌ أَنْ يُسْلِمَ قَلْبُكَ لِلَّهِ وَأَنْ يَسْلَمَ مِنْكَ كُلُّ مُسْلِمٍ وَكُلُّ ذِي عَهْدٍ

इस्लाम क्या है? यह कि आपका दिल अल्लाह के लिए ख़ालिस हो जाए, और आपसे हर मुसलमान और ज़िम्मी महफ़ूज़ हो जाये (मुसन्नफ़ इब्ने शैबा: 14/23, इसकी सनद सहीह है)

ज़ोहरी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाने बारी तआला: قَالَتِ الْاَعْرَابُ اٰمَنَّا١ؕ قُلْ لَّمْ تُؤْمِنُوْا وَ لٰكِنْ قُوْلُوْۤا اَسْلَمْنَا की तफ़सीर में फ़रमाते हैं:

نَرَى أَنَّ الْإِسْلَامَ الْكَلِمَةُ , وَالْإِيمَانَ الْعَمَلُ

हमारे मुताबिक़ इस्लाम कलिमा और ईमान अमल है (तफ़सीर अब्दुर्रज्ज़ाक़: 3/233-234, इसकी सनद सहीह है)

इमाम ज़ोहरी रहमतुल्लाह अलैह की मुराद यह है कि तौहीद व रिसालत की गवाही देने वाले को मुसलमान कहा जाता है, मुनाफ़िक़ आदि इसमें शामिल होते हैं, लेकिन ईमान सिर्फ़ उसी के मुक़द्दर में होता है, जो अमल करे और असल अमल तो दिल का है, इस तरह इमाम साहब का यह फ़रमान इस्लाम को ज़ाहिर और ईमान को बातिन से ख़ास करता है, लिहाज़ा इस्लाम को कलिमा कहना, लुग़वी तौर पर है, न कि शरअई ऐतबार से, क्यूंकि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हदीसे जिब्रील में और हदीसे इब्ने उमर में इसकी जो वज़ाहत की है, वो ज़ोहरी रहमतुल्लाह अलैह जैसे इमाम से छुपी हुई नहीं थी

शेख़ुल इस्लाम इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

जब तौहीद व रिसालत की गवाही देने वाला हर शख़्स यहूद व नसारा से जुदा होकर मुसलमान बन जाता है और इस पर इस्लामी अहकाम जारी हो जाते हैं, तो बिना अपवाद इसी को बिलजज़्म इख़्तियार किया जाएगा, यही वजह है कि इमाम ज़ोहरी रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं, इस्लाम कलिमा है, इमाम अहमद रहमतुल्लाह अलैह आदि ने उनकी मुवाफ़िक़त भी की है, उनकी मुराद यह न थी कि ज़रूरी इस्लाम सिर्फ़ कलिमा ही है, क्यूंकि ज़ोहरी रहमतुल्लाह अलैह जैसे शख़्स से यह छुपा रहना नामुमकिन है(मजमुअल फ़तावा: 7/415)

हिन्दी तर्जुमा: मुहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)

 

 

 

 

Sunday, March 28, 2021

कलिमा ए तौहीद (Kalima e Tauheed)

 

कलिमा ए तौहीद

शेख़ ग़ुलाम मुस्तफ़ा ज़हीर अमनपुरी हफ़िज़ल्लाह

ला इलाहा इल्लल्लाह दीने इस्लाम की असास, ईमान व कुफ़्र में फ़र्क़ और निजात का राज़ है, यह वो मज़बूत कड़ा है, जिसे थामने वाला राहे हक़ से कभी नहीं भटक सकता, यह कलिमा ए शहादत हक़ और दावते हक़ है, जिस पर ज़मीन व आसमान का निज़ाम क़ायम है और हिसाब व किताब का अमल इसी पर निर्भर है। यह तमाम इंसानों की फ़ितरत भी है और तमाम नबियों की विरासत भी, यही अज़ाबे क़ब्र से निजात की वजह और जन्नत की कुंजी है, अल्लाह तआला तक पहुँचने के लिए इसी मज़बूत सहारे की ज़रुरत है, इसी से ख़ुश बख़्त और बदनसीब में फ़र्क़ किया जाता है। यह इंसानों पर अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत है, यह अल्लाह तआला का बन्दों पर हक़ है, यह अल्लाह के अलावा तमाम माबूदों की नफ़ी करता है, ख़ुद अल्लाह तआला ने इसकी गवाही दी और फ़रिशतों और अहले इल्म ने इसकी तौसीक़ की।

फ़रमाने बारी तआला है:

شَهِدَ اللّٰهُ اَنَّهٗ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ١ۙ وَ الْمَلٰٓىِٕكَةُ وَ اُولُوا الْعِلْمِ قَآىِٕمًۢا بِالْقِسْطِ١ؕ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ الْعَزِیْزُ الْحَكِیْمُؕ۝۱۸

“अल्लाह तआला, उसके फ़रिशतों और इन्साफ़ वाले अहले इल्म ने गवाही दी है कि अल्लाह के सिवा कोई इलाह नहीं, वही ग़ालिब हिकमत वाला है।” (आले इमरान:18)

तमाम रसूलों को अल्लाह तआला ने इसी कलिमे के साथ भेजा है, फ़रमाया:

وَ مَاۤ اَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رَّسُوْلٍ اِلَّا نُوْحِیْۤ اِلَیْهِ اَنَّهٗ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّاۤ اَنَا فَاعْبُدُوْنِ۝۲۵

“हमने आपसे पहले जितने रसूल भेजे सबकी तरफ़ यह वही की कि मेरे सिवा कोई इलाह नहीं, तो सिर्फ़ मेरी इबादत करो।” (अल-अम्बिया:25)

हाफ़िज़ इब्ने क़य्यिम रहमतुल्लाह अलैह (751हि) मोमिन दे दिल में इस कलिमे के असर का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं:

من رَسَخَت هذه الكلمةُ في قلبه بحقيقتها التي هي حقيقتها واتَّصَف قلبُه بها وانْصَبَغَ بها بصبغة اللَّه التي لا أحسن صبغةً منها، فعرف حقيقة الإلهيَّة التي يُثْبتها قلبه للَّه ويَشهد بها لسانُه وتُصَدِّقها جوارحه، ونَفَى تلك الحقيقة ولوازمها عن كل ما سوى اللَّه، وواطأ قلبُه لسانَه في هذا النفي والإثبات، وانقادتْ جوارحُه لمن شهد له بالوحدانية طائعةً سالكةً سبلَ ربه ذُللًا غير ناكبةٍ عنها ولا باغيةٍ سواها بدلًا، كما لا يبتغي القلبُ سوى معبوده الحق بدلًا؛ فلا ريب أنَّ هذه الكلمة مِنْ هذا القلب على هذا اللسان لا تزال تُؤتي ثمرها من العمل الصالح الصاعِدِ [إلى اللَّه كل وقت؛ فهذ  الكلمة الطيبة هي التي رفعت هذا العمل الصالح الصاعد إلى الربِّ تعالى ، وهذه الكلمة الطيبة تُثمرُ كَلِمًا  كثيرًا طيِّبًا يقارنه  عملٌ صالح فيرفعُ العملُ الصَّالحُ الكلمَ الطيب، كما قال تعالى: {إِلَيْهِ يَصْعَدُ الْكَلِمُ الطَّيِّبُ وَالْعَمَلُ الصَّالِحُ يَرْفَعُهُ (فاطر: 10) فأخبر سبحانه  أن العمل الصالح يرفع الكلم الطيب، وأخبر أن الكلمة الطيبة تُثْمر لقائلها عملًا صالحًا كل وقت.

“जिस शख़्स के दिल में यह कलिमा हक़ीक़तन रासिख़ हो जाये, उसका दिल, इस कलिमे की हक़ीक़त को जानने वाला और अल्लाह के इस रंग में रंगा जाये, जिससे अच्छा कोई और रंग नहीं हो सकता, वो ज़ाते इलाही को जानने वाला हो जायेगा, जो दिल को अल्लाह के लिए पुख़्ता कर देती है, उसकी ज़बान इसकी गवाही देने लगती है और जिस्म के हिस्से इसकी तसदीक़ शुरू कर देते हैं। यह हक़ीक़त और उसके लाज़िमात अल्लाह के सिवा हर चीज़ की नफ़ी करते हैं, फिर दिल इस नफ़ी और मानने में ज़बान का साथ देता है और जिस्म के हिस्से उस ज़ात के लिए फ़रमाबरदार हो जाते हैं, जिसके लिए तौहीद की गवाही दी होती है, उसके सिवा किसी की ज़रुरत नहीं रहती, यक़ीनन इस दिल व ज़बान से जारी होने वाला यह कलिमा नेक आमाल की सूरत में हर वक़्त फल देता रहता है, यही कलिमा इस नेक अमल को अल्लाह की तरफ़ बुलंद करता है, फ़रमाने बारी तआला है: यह (कलिमा) इस नेक अमल को अल्लाह की तरफ़ बुलंद करता है और अपने कहने वाले को हर वक़्त नेक अमल की तरफ़ शौक़ पैदा करता रहता है। ख़ुलासा यह कि जब मोमिन कलिमा ए तौहीद के माने व मफ़हूम को जानते हुए इसकी गवाही देता है, इसके तक़ाज़ो को पूरा करता है, उसका दिल, ज़बान और जिस्म के हिस्से उसकी तौसीक़ करते हैं, तो फिर यही कलिमा गवाही देने वाले के नेक अमल को बुलंद करता है, इस अमल की जड़ मज़बूत और रासिख़ होकर इसके दिल में होती है और इसकी शाख़ें आसमानों तक पहुँच जाती हैं और यह हर वक़्त नेक अमल की सूरत में फल देता रहता है।” (ऐलामुल मोक़िईन:1/172-173)

कआब अहबार रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं:

“अल्लाह तआला ने कलाम का चुनाव किया, तो अल्लाह के नज़दीक पसंदीदा कलाम ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ ठहरा, यह कलिमा इख़लास है, जो यह कलिमा पढ़ेगा, अल्लाह तआला उसके लिए बदले में बीस नेकियाँ लिख देगा और उसकी बीस बुराइयाँ मिटा देगा और जो ‘अल्लाहुअकबर’  कहेगा, अल्लाह तआला इसके बदले उसके लिए बीस नेकियाँ लिखेगा और बीस बुराइयाँ मिटा देगा, क्यूंकि यह अल्लाह तआला की ताज़ीम पर मबनी कलिमे हैं और जो शख़्स ‘सुबहानल्लाह’ कहेगा, उसके लिए अल्लाह तआला बीस नेकियाँ लिख देगा और बीस बुराइयाँ मिटा देगा और ‘अल्हम्दुल्लिल्लाह’ कहेगा तो यह अल्लाह की सना है और सना हम्द ही होती है, उसके लिए अल्लाह तआला तीस नेकियाँ लिख देगा और तीस बुराइयाँ मिटा देगा।” (अमअलुल यौम वल लैल लिननसाई: 843, इसकी सनद हसन है)

क़तादा रहमतुल्लाह {{اَلَا لِلّٰهِ الدِّیْنُ الْخَالِصُ}} (अज़-ज़ुमर:3) अलैह की तफ़सीर में फ़रमाते हैं:

“इससे मुराद ला इलाहा इल्लल्लाह की गवाही है।” (तफ़सीर अब्दुर्रज्ज़ाक़:3/171, इसकी सनद सहीह है)

इस आयत की तफ़सीर में अल्लामा मुहम्मद अमीन शिनक़ीती रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

أَمَرَ اللَّهُ جَلَّ وَعَلَا نَبِيَّهُ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ. فِي هَذِهِ الْآيَةِ الْكَرِيمَةِ، أَنْ يَعْبُدَهُ فِي حَالِ كَوْنِهِ، مُخْلِصًا لَهُ الدِّينَ، أَيْ مُخْلِصًا لَهُ فِي عِبَادَتِهِ، مِنْ جَمِيعِ أَنْوَاعِ الشِّرْكِ صَغِيَرِهَا وَكَبِيرِهَا، كَمَا هُوَ وَاضِحٌ مِنْ لَفْظِ الْآيَةِ. وَالْإِخْلَاصُ، إِفْرَادُ الْمَعْبُودِ بِالْقَصْدِ، فِي كُلِّ مَا أَمَرَ بِالتَّقَرُّبِ بِهِ إِلَيْهِ، وَمَا تَضَمَّنَتْهُ هَذِهِ الْآيَةُ الْكَرِيمَةُ، مِنْ كَوْنِ الْإِخْلَاصِ فِي الْعِبَادَةِ لِلَّهِ وَحْدَهُ، لَا بُدَّ مِنْهُ، جَاءَ فِي آيَاتٍ مُتَعَدِّدَةٍ، وَقَدْ بَيَّنَ جَلَّ وَعَلَا، أَنَّهُ مَا أَمَرَ بِعِبَادَةٍ، إِلَّا عِبَادَةً يُخْلِصُ لَهُ الْعَابِدُ فِيهَا وَقَوْلُهُ تَعَالَى فِي هَذِهِ الْآيَةِ الْكَرِيمَةِ: أَلَا لِلَّهِ الدِّينُ الْخَالِصُ أَيِ: التَّوْحِيدُ الصَّافِي مِنْ شَوَائِبِ الشِّرْكِ، أَيْ: هُوَ الْمُسْتَحِقُّ لِذَلِكَ وَحْدَهُ، وَهُوَ الَّذِي أَمَرَ بِهِ. وَقَوْلُ مِنْ قَالَ مِنَ الْعُلَمَاءِ: إِنَّ الْمُرَادَ بِالدِّينِ الْخَالِصِ كَلِمَةُ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ مُوَافِقٌ لِمَا ذَكَرْنَاهُ. وَالْعِلْمُ عِنْدَ اللَّهِ تَعَالَ

इस आयते करीमा में अल्लाह तआला ने अपने नबी को हुक्म दिया है कि वो ख़ालिस उसकी इबादत करें, यानी उसकी इबादत को शिर्क की तमाम क़िस्मों से पाक करें, चाहे शिर्के असग़र हो या अकबर, यही मुराद आयत से वाज़ेह है।”

इख़लास यह है कि अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करने के लिए इबादत की जितनी भी सूरतें हैं, उनमें अल्लाह को लाशारीक कर दिया जाये, मालूम हुआ कि इख़लास ज़रूरी चीज़ है, बहुत सी आयतों में इसकी ताकीद है, अल्लाह का फ़रमान है कि उसने सिर्फ़ ऐसी इबादत का हुक्म दिया है, जो आबिद की तरफ़ से ख़ालिस उसी के लिए हो। इस आयते करीमा में फ़रमाने बारी तआला: से मुराद वो तौहीद है, जो शिर्क की मिलावट से भी पाक हो, यानी सिर्फ़ वही उसका मुसतहक़ है और इसी का उसने हुक्म दिया है, जिन उलमा ने इस आयत में ‘अद-दीनुल ख़ालिस’ से मुराद ला इलाह इल्लल्लाह लिया है, हमारी बात उनके मुआफ़िक़ है, वल्लाहु आलम।” (अज़वाउल बयान:7/42)

अम्र बिन मैमून रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि फ़रमाने बारे तआला: {{وَ اَلْزَمَهُمْ كَلِمَةَ التَّقْوٰى}} (अल-फ़तह:26) “अल्लाह ने उन मुसलमानों को तक़वे का कलिमा अता कर दिया।, में ‘“कलिमतुत तक़वा”’ की तफ़सीर ला इलाहा इल्लल्लाह है। (तफ़सीरे तबरी:31585, हुलियतुल औलिया:4/194, इसकी सनद सहीह है)

क़तादा बिन दिआमा रहमतुल्लाह अलैह से भी यही तफ़सीर मनक़ूल है। (तफ़सीर अब्दुर्रज्ज़ाक़:3/229, इसकी सनद सहीह है)

इमाम मुजाहिद रहमतुल्लाह अलैह भी यही कहते है। (तफ़सीरे तबरी:31588, इसकी सनद सहीह है)

हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

لا إله إلا الله ثَمَنُ الجنَّة

“ला इलाहा इल्लल्लाह जन्नत की क़ीमत है।” (मुसन्न्फ़ इब्ने अबी शैबा:13/529, इसकी सनद सहीह है)

इस आयत की तफ़सीर में अल्लामा शिनक़ीती रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं:

इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने इस कलिमे तौहीद को दो तरह से अपनी औलाद में बाक़ी रखा; एक तो इस तरह कि अपनी औलाद को इसकी वसीयत की, वो पुश्त दर पुश्त एक दुसरे को यही वसीयत करते आये, जैसा कि इस आयते मुबारका में अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया है:

وَ مَنْ یَّرْغَبُ عَنْ مِّلَّةِ اِبْرٰهٖمَ اِلَّا مَنْ سَفِهَ نَفْسَهٗ١ؕ وَ لَقَدِ اصْطَفَیْنٰهُ فِی الدُّنْیَا١ۚ وَ اِنَّهٗ فِی الْاٰخِرَةِ لَمِنَ الصّٰلِحِیْنَ۝۱۳۰ِذْ قَالَ لَهٗ رَبُّهٗۤ اَسْلِمْ١ۙ قَالَ اَسْلَمْتُ لِرَبِّ الْعٰلَمِیْنَ۝۱۳۱وَ وَصّٰى بِهَاۤ اِبْرٰهٖمُ بَنِیْهِ وَ یَعْقُوْبُ١ؕ یٰبَنِیَّ اِنَّ اللّٰهَ اصْطَفٰى لَكُمُ الدِّیْنَ

कौन है, जो इब्राहीम के दीन से मुंह मोड़े, सिवाए उसके जिसने अपने आपको बेवक़ूफ़ बना लिया हो, हमने उनको दुनिया में चुन लिया था और आख़िरत में भी नेकोकारों में से होंगे, उस वक़्त को याद करो, जब उनको रब ने फ़रमाया: फ़रमाबरदार हो जाओ, तो कहने लगे: मैं जहानों के रब के लिए फ़रमांबरदार हो गया हूँ और इब्राहीम ने इस बात की अपने बीटों को वसीयत की, फिर याक़ूब ने भी कि बेशक अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए दीन (तौहीद) को चुन लिया है।”(अल-बक़रा: 130-132) दुसरे इस तरह कि आप अलैहिस्सलाम ने अल्लाह से अपनी औलाद के ईमान व इस्लाह के लिए dua की थी, अल्लाह तआला ने इसे यूं बयान किया है:

وَ اِذِ ابْتَلٰۤى اِبْرٰهٖمَ رَبُّهٗ بِكَلِمٰتٍ فَاَتَمَّهُنَّ١ؕ قَالَ اِنِّیْ جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ اِمَامًا١ؕ قَالَ وَ مِنْ ذُرِّیَّتِیْ

जब इब्राहीम को उसके रब ने कुछ अवामिर व नवाही से आज़माया, आपने उनको पूरा कर दिखाया, अल्लाह ने फ़रमाया: मैं तुजे लोगों के लिए इमाम बनाऊँगा, उसने कहा; मेरी औलाद से भी (इमाम बना दे)।”(अल-बक़रा: 124) अल्लाह तआला ने इसके बाद आने वाले तमाम नबियों को उनकी औलाद से पैदा किया, जैसा कि सूरह अनकबूत में फ़रमाया:

وَ وَهَبْنَا لَهٗۤ اِسْحٰقَ وَ یَعْقُوْبَ وَ جَعَلْنَا فِیْ ذُرِّیَّتِهِ النُّبُوَّةَ وَ الْكِتٰبَ

हमने उसे इसहाक़ और याक़ूब अता किये और नबूवत और किताब उनकी औलाद में जारी कर दी।”(अनकबूत:27) सूरह ज़ुख़रुफ़ की इस आयत में अल्लाह ने बयान कर दिया है कि उसने इब्राहीम अलैहिस्सलाम की इस दुआ को उनकी तमाम औलाद के बारे में क़ुबूल नहीं किया और इस कलिमे तौहीद को उनकी तमाम औलाद में बाक़ी नहीं रखा, क्यूंकि कुफ्फ़ारे मक्का जिन्होंने हमार नबी को झुटलाया था, वो भी बिलइत्तिफ़ाक़ इब्राहीम अलैहिस्सलाम की पुश्त से थे। (अज़वाउल बयान7/231-232)

इमाम क़तादा रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाने इलाही: {{ كَانَ النَّاسُ اُمَّةً وَّاحِدَةً۫}} लोग पहले एक ही ग्रोह थेकी तफ़सीर में फ़रमाते हैं:

كَانُوا عَلَى الْهُدَى جَمِيعًا , فَاخْتَلَفُوا , فَبَعَثَ اللَّهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنْذِرِينَ , وَكَانَ أَوَّلَ نَبِيٍّ بُعِثَ نُوحٌ عَلَيْهِ السَّلَامُ

सब लोग हिदायत पर थे, फिर उनमें इख़्तिलाफ़ हो गया, तो अल्लाह ने ख़ुशख़बरी देने वाले और डराने वाले नबी भेजे और पहले नबी जो मबऊस हुए नूह अलैहिस्सलाम थे(तफ़सीर अब्दुर्रज्ज़ाक़: 1/82, इसकी सनद सहीह है)

इमाम अली बिन हुसैन रहमतुल्लाह अलैह अपने बेटे को यह दुआ सिखाते थे:

آمَنْتُ بِاللَّهِ وَكَفَرْتُ بِالطَّاغُوتِ

मैं अल्लाह पर ईमान लाया और ताग़ूत को का कुफ़्र किया।”””” (मुसन्नफ़इब्ने अबी शैबा:1/342, इसकी सनद हसन है)

अबू वाइल शक़ीक़ बिन सलमा रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं: फ़रमाने बारी तआला:

{{مَنْ جَآءَ بِالْحَسَنَةِ}} जो कोई नेकी लाएगा(अल-अनआम:160) में नेकी से मुराद ला इलाहा इल्लल्लाह है।” (अद-दुआ लिततबरानी:1529, तफ़सीर तबरी:1458, इसकी सनद हसन है)।

अता बिन अबी रिबाह रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

{{مَنْ جَآءَ بِالسَّیِّئَةِ}} में ‘हसअनह’ से मुराद कलिमा ए इख़लास ला इलाहा इल्लल्लाहऔर में ‘सय्यिअह’ से मुराद शिर्क है।” (तफ़सीर तबरी:14289, इसकी सनद सहीह है)

ज़ैद बिन असलम रहमतुल्लाह अलैह ने भी यही तफ़सीर की है।” (अद-दुआ लिततबरानी1533, इसकी सनद सहीह है)

मुहम्मद बिन सिरीन रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

फ़रमाने इलाही:

اِلَّا مَنْ اَتَى اللّٰهَ بِقَلْبٍ سَلِیْمٍؕ۝۸۹

मगर जो अल्लाह ने पास सलामत दिल ले कर आये(अश-शुअरा:89) में दिल की सलामती से मुराद ला इलाहा इल्लल्लाह की गवाही है।” (अद-दुआ लिततबरानी:1587, इसकी सनद सहीह है)

ज़्यादातर लोग ला इलाहा इल्लल्लाह कहते हैं, लेकिन वो इख़लास, यक़ीने कामिल और हाज़िरे क़ल्ब जो इससे हासिल होने चाहिए, उन्हें नसीब नहीं होती, इसकी वजह यह है कि वो महज़ सुन सुना कर, देखा देखी और एक आदत के तौर पर इसका इक़रार करते हैं, लिहाज़ा ज़रूरी है कि हम इस कलिमे की असल रूह और इसके तक़ाज़े व शर्तों को बयान कर दें, ताकि इससे हक़ीक़ी फ़ायदे हासिल हो सकें क्यूंकि सिर्फ़ अलफ़ाज़ को रट लेना फ़ायदेमंद नहीं।”

हाफ़िज़ हकअमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

لَيْسَ الْمُرَادُ مِنْ ذَلِكَ عَدَّ أَلْفَاظِهَا وَحِفْظَهَا فَكَمْ مِنْ عَامِّيٍّ اجْتَمَعَتْ فِيهِ وَالْتَزَمَهَا وَلَوْ قِيلَ لَهُ: أُعْدُدْهَا لَمْ يُحْسِنْ ذَلِكَ, وَكَمْ حَافِظٍ لِأَلْفَاظِهَا يَجْرِي فِيهَا كَالسَّهْمِ وَتَرَاهُ يَقَعُ كَثِيرًا فِيمَا يُنَاقِضُهَا

कलिमा पढ़ने से मुराद इसके अलफ़ाज़ की गिनती और रट लेना नहीं होता, कितने ही अनपढ़ लोग हैं, जिन्होंने कलिमा पढ़ा और फिर इसके तक़ाज़े भी पूरे किये, लेकिन अगर उनसे कहा जाए कि इसके अलफ़ाज़ को शुमार करो तो न कर सकेंगे, इसके विपरीत कितने ही पढ़े लिखे ऐसे हैं कि पानी की तरह रवानी से पढ़ते हैं लेकिन उनके ज़्यादातर काम कलिमे के ख़िलाफ़ होते हैं(मआरिजुल क़ुबूल:1/333)

हाफ़िज़ इब्ने क़य्यिम रहमतुल्लाह अलैह (हि751) लिखते हैं:

رُوحُ هَذِهِ الْكَلِمَةِ وَسِرُّهَا: إِفْرَادُ الرَّبِّ - جَلَّ ثَنَاؤُهُ، وَتَقَدَّسَتْ أَسْمَاؤُهُ، وَتَبَارَكَ اسْمُهُ، وَتَعَالَى جَدُّهُ، وَلَا إِلَهَ غَيْرُهُ - بِالْمَحَبَّةِ وَالْإِجْلَالِ وَالتَّعْظِيمِ وَالْخَوْفِ وَالرَّجَاءِ وَتَوَابِعِ ذَلِكَ: مِنَ التَّوَكُّلِ وَالْإِنَابَةِ وَالرَّغْبَةِ وَالرَّهْبَةِ، فَلَا يُحَبُّ سِوَاهُ، وَكُلُّ مَا كَانَ يُحَبُّ غَيْرَهُ فَإِنَّمَا يُحَبُّ تَبَعًا لِمَحَبَّتِهِ، وَكَوْنِهِ وَسِيلَةً إِلَى زِيَادَةِ مَحَبَّتِهِ، وَلَا يُخَافُ سِوَاهُ، وَلَا يُرْجَى سِوَاهُ، وَلَا يُتَوَكَّلُ إِلَّا عَلَيْهِ، وَلَا يُرْغَبُ إِلَّا إِلَيْهِ، وَلَا يُرْهَبُ إِلَّا مِنْهُ، وَلَا يُحْلَفُ إِلَّا بِاسْمِهِ، وَلَا يُنْظَرُ إِلَّا لَهُ، وَلَا يُتَابُ إِلَّا إِلَيْهِ، وَلَا يُطَاعُ إِلَّا أَمْرُهُ، وَلَا يُتَحَسَّبُ إِلَّا بِهِ، وَلَا يُسْتَغَاثُ فِي الشَّدَائِدِ إِلَّا بِهِ، وَلَا يُلْتَجَأُ إِلَّا إِلَيْهِ، وَلَا يُسْجَدُ إِلَّا لَهُ، وَلَا يُذْبَحُ إِلَّا لَهُ وَبِاسْمِهِ، وَيَجْتَمِعُ ذَلِكَ فِي حَرْفٍ وَاحِدٍ، وَهُوَ: أَنْ لَا يُعْبَدَ إِلَّا إِيَّاهُ بِجَمِيعِ أَنْوَاعِ الْعِبَادَةِ، فَهَذَا هُوَ تَحْقِيقُ شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَلِهَذَا حَرَّمَ اللَّهُ عَلَى النَّارِ مَنْ شَهِدَ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ حَقِيقَةَ الشَّهَادَةِ، وَمُحَالٌ أَنْ يَدْخُلَ النَّارَ مَنْ تَحَقَّقَ بِحَقِيقَةِ هَذِهِ الشَّهَادَةِ وَقَامَ بِهَا، كَمَا قَالَ تَعَالَى: {وَالَّذِينَ هُمْ بِشَهَادَاتِهِمْ قَائِمُونَ} سُورَةُ الْمَعَارِجِ: 33} فَيَكُونُ قَائِمًا بِشَهَادَتِهِ فِي ظَاهِرِهِ وَبَاطِنِهِ، فِي قَلْبِهِ وَقَالَبِهِ

इस कलिमे की असल रूह और हक़ीक़त यह है कि अल्लाह तबारक व तआला को मुहब्बत, ताज़ीम, इकराम, ख़ौफ़, रिजा, तवक्कुल, रुजूअ, रग़बत, हैबत आदि में अकेला माना जाए, यानी उसके सिवा किसी से मुहब्बत न की जाये, अगर उसके अलावा किसी से मुहब्बत हो भी, तो उसकी मुहब्बत के ताबेअ बना कर या उसकी मुहब्बत का ज़रिया समझ कर और उसके सिवा किसी से ख़ौफ़ न रखा जाए, न किसी से उम्मीद रखी जाए, नज़र दी जाए तो उसकी, रुजूअ किया जाए तो उसकी तरफ़, बात मानी जाये तो उसकी, सवाब की उम्मीद की जाये, तो उससे, मुसीबतों में मदद मांगी जाये तो उससे, फ़रयाद की जाये तो उसी से, सजदा किया जाये तो उसी को, ज़िबह कियह जाए तो उसे के लिए और उसी के नाम पर इन सब बातों को एक ही जुमले यूं कहा जा सकता है कि इबादत की कोई भी क़िस्म उसके अलावा किसी के लिए भी न रखी जाए।” यह है ला इलाहा इल्लल्लाह का असल मतलब, यही वजह है कि यह गवाही देने वाले पर आग हराम हो जाती है और जिसने हक़ीक़तन य ह कालिमा पद लिया और उइड पर डटा रहा, उसका आग में दाख़िल होना नामुमकिन है, फ़रमाने इलाही है: वो लोग (जहन्नम से बच जायेंगें) जो अपनी गवाही पर क़ायम रहते हैं।”यानी वो इस गवाही को अपने ज़ाहिर व बातिन और क़ल्ब व क़ालिब पर क़ायम कर लेते हैं(अल-जवाबुल काफ़ी, पेज नंबर 290)

कालिमा ए इख़लास के फ़ज़ीलत के बारे में हदीसें बयान करने के बाद हाफ़िज़ इब्ने रजब रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं:

इस बारे में दो तरह की हदीसें औई हैं, एक तो यह कि जो तौहीद व रिसालत की गवाही देता है, जन्नत में दाख़िल हो जाएगा, इससे रोका नहीं जाएगा, यह तो वाज़ेह है, जबकि दूसरी हदीसों में यह है कि वो आग पर हराम हो जाएगा, कुछ उलमा ने इसे हमेशा रहने पर महमूल किया है, यानी वो हमेशा आग में नही रहेगा, अक्सर उलमा का कहना है कि इन हदीसों की मुराद यह है कि ला इलाहा इल्लल्लाह जन्नत में दाख़ले और आग से निजात का सबब है, लेकिन इसके कुछ तक़ाज़े हैं और यह तब ही अपना काम करेगा, जब उसके तक़ाज़े पूरे हों और ख़िलाफ़ न हों, कभी कभी शर्तें पूरी न होने या रुकावट की मौजूदगी की वजह से यह नाकाम हो जाता है, हसन बसरी और वहब बिन मुनब्बा रहमतुल्लाह अलैहिमा का यही क़ल है और यही बात राजेह है”। (कलिमतुल इख़लास व तहक़ीक़ मअना हा लिब्ने रजब पेज नंबर 12-13)

लिहाज़ा कालिमा ए इख़लास की निम्नलिखित शर्तें हैं:

1.   माना व मफ़हूम का इल्म।”

2.  कामिल यक़ीन।”

3.  ”क़ुबूल।”

4.  इताअत।”

5.  सिद्क़।”

6.  इख़लास।”

7.  मुहब्बत।”

जब कलिमा पढ़ने वाले में यह सब शर्तें मौजूद होंगी तो यह कलिमा फ़ायदेमंद और निजात व कामयाबी की वजह बनेगा।”

हिन्दी तर्जुमा: मुहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)

 

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 8

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم● 🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃 📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒 ✒️ लेख़क: अ...