أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●
🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃
📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒
✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद
🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)
🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁
➡️ भाग 2
इस सूरह करीमा के पढ़ कर
फूँकने से यानी दम से साँप आदि के ज़हर का असर अल्लाह के हुक्म से ख़त्म हो जाता है,
जैसा कि सय्यदना अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाह अन्हु बयान करते हैं कि अरब के एक क़बीले
के पास से कुछ सहाबा का गुज़र हुआ, क़बीले वालों ने सहाबा की मेहमान नवाज़ी से इन्कार
कर दिया, इसी दौरान में उनके सरदार को बिच्छू (या साँप) ने काट लिया, क़बीले वालों
से सहाबा से कहा, तुम्हारे पास कोई दवा हो, या तुम लोगों में कोई दम झाड़ करने वाला
शख़्स हो? सहाबा ने कहा, तुमने हमारी मेहमान नवाज़ी नहीं की, लिहाज़ा जब तक तुम हमें
कुछ माल न दोगे हम इलाज नहीं करेंगे। इस पर उन लोगों ने कुछ बकरियाँ देने का वादा
किया तो एक शख़्स ने सुरह फ़ातिहा पढ़नी शुरू की और साथ साथ वो थूक जमा करता और
(काटने वाली जगह पर) थुतकारता जाता, तो इस तरह सरदार अच्छा हो गया, वो बकरियाँ ले
कर आये तो कुछ सहाबा ने कहा, हम बकरियाँ नहीं लेंगे, जब तक कि रसूलुल्लाह
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछ न लें, वापसी पर उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु
अलैहि से पूछा, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि इस पर मुस्करा दिये और इस शख़्स से
फ़रमाया: “तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि ये सूरत रुक़्या (दम) है? (तुमने ठीक किया) ये
बकरियाँ ले लो और अपने साथ मेरा भी हिस्सा निकालो”। [बुख़ारी: 5736, मुस्लिम: 5733]
इस हदीस से मालूम हुआ
कि सुरह फ़ातिहा रुक़्या है, इसके ज़रिये से दम करके इलाज किया जा सकता है और वाज़ेह
हुआ कि ज़रुरत के वक़्त क़ुरआन मजीद पर उजरत (मेहनताना) लेना जायज़ है। सहाबा किराम
रज़ियल्लाहू अन्हुम ने उजरत इसलिये मांगी थीं क्यूंकि बस्ती वालों ने उनकी मेहमान
नवाज़ी से इन्कार कर दिया था, लिहाज़ा जायज़ दम करना और इसकी उजरत लेना जायज़ है लेकिन
इसे एक हमेशा के लिए पेशा बना लेना साबित नहीं, फिर बिना मतलब वाले अलफ़ाज़ से तावीज़
लिखना, उन्हें पानी में घोल कर पिलाना, गले में लटकाना या किसी दूसरी जगह बाँधना,
तो ऐसे काम शरअन हराम हैं।
सुरह
फ़ातिहा ही नमाज़ है, जैसा कि सय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि
मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ये फ़रमाते हुए सुना, आप फ़रमा रहे थे:
“अल्लाह तआला फ़रमाता है कि मैंने नमाज़ को अपने और अपने बन्दे के बीच दो हिस्सों
में बाँट दिया है और मेरे बन्दे के लिए वो कुछ है जिसका वो सवाल करे, बन्दा जब
कहता है: { اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ
رَبِّ الْعٰلَمِيْنَ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, मेरे बन्दे ने
मेरी तारीफ़ की है और जब कहता है: { الرَّحْمٰنِ
الرَّحِيْمِ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है मेरे बन्दे ने मेरी सना की है और जब
कहता है: { مٰلِكِ يَوْمِ
الدِّيْنِ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, मेरे बन्दे ने मेरी बुज़ुर्गी बयान की
और यूँ भी फ़रमाता है कि मेरे बन्दे ने (अपना मामला) मेरे सुपुर्द कर दिया। बन्दा
जब कहता है: { اِيَّاكَ نَعْبُدُ
وَاِيَّاكَ
نَسْتَعِيْنُ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, ये मेरे और मेरे बन्दे के बीच है और
मेरे बन्दे के लिए वो कुछ है जिसका वो सवाल करे और जब बन्दा ये कहता है:
} اِھْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَـقِيْمَ Ĉۙصِرَاطَ الَّذِيْنَ اَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ ۹ غَيْرِ الْمَغْضُوْبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّاۗلِّيْنَ{
तो अल्लाह तआला फ़रमाता
है, ये मेरे बन्दे के लिए है और मेरे बन्दे के लिए वो कुछ है जिसका वो सवाल करे”। [मुस्लिम:
878]
जारी है...................................
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पहला भाग कहा है
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