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Monday, September 9, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 8

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 8

बच्चों के लिए अल्लाह की पनाह चाहना, जैसा कि सय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हुमा बयान करते हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हसन व हुसैन रज़ियल्लाहू अन्हुमा के लिए इन शब्दों के ज़रिये पनाह तलब किया करते थे: {{أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّةِ مِنْ كُلِّ شَيْطَانٍ وَهَامَّةٍ وَمِنْ كُلِّ عَيْنٍ لَامَّةٍ}}“मैं अल्लाह के तमाम कलिमात एक साथ (तुम दोनों के लिए) हर शैतान से और उस मख़लूक़  से जो बुराइ का इरादा करे और हर नज़र लगाने वाली आँख से पनाह मांगता हूँ”। [बुख़ारी: 3371]

बीमारी के वक़्त अल्लाह की पनाह माँगना, जैसा कि सय्यदना उस्मान बिन अबुल आस रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से एक बीमारी की शिकायत की जो इस्लाम क़ुबूल करने के बाद मैंने पहली बार महसूस की थी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “अपने हाथ को अपने जिस्म पर तकलीफ़ वाली जगह रख कर तीन बार ‘बिस्मिल्लाह’ कहो और सात बार ये दुआ पढ़ो: {{}} ‘मैं अल्लाह तआला की और उसकी क़ुदरत की पनाह पकड़ता हूँ उस चीज़ के शर से जो मैं पाता हूँ और जिससे डरता हूँ’”। [मुस्लिम: 5737]

बुरा ख़्वाब देखने पर अल्लाह की पनाह तलब करना, जैसा कि सय्यदना अबू क़तादा रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “अच्छा ख़्वाब अल्लाह तआला की तरफ़ से होता है और बुरा ख़्वाब शैतान की तरफ़ से होता है, तो अगर तुममें से कोई शख़्स बुरा ख़्वाब देख कर उससे डर जाए तो वो अपनी बाईं तरफ़ थुतकारे और अल्लाह तआला से उसके शर से पनाह मांगे तो वो उसे नुक़सान न पहुँचायेग”। [बुख़ारी: 3292]

सुबह व शाम और बिस्तर पर लेटते वक़्त अल्लाह की पनाह में आना जैसा कि सय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि सय्यदना अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हु ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे ऐसी दुआ सिखा दीजिये जो मैं सुबह व शाम पढ़ा करूँ। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “ये पढ़ा करो:

}}اللَّهُمَّ عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي وَمِنْ شَرِّ الشَّيْطَانِ وَشِرْكِهِ{{

‘ऐ अल्लाह! ज़ाहिर व छुपे हुए को जानने वाले! आसमान व ज़मीन के पैदा करने वाले! हर चीज़ को पालने वाले और उसके मालिक! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, मैं अपने नफ़्स के शर से और मरदूद शैतान के शर और शिर्क से तेरी पनाह चाहता हूँ’” फिर आपने फ़रमाया: “इस दुआ को सुबह व शाम और रात को बिस्तर पर जाते वक़्त पढ़ा करो”। [तिरमिज़ी: 3392]

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Friday, September 6, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 7

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 7

किसी वादी या मंज़िल पर पड़ाव के वक़्त अल्लाह की पनाह में आना, जैसा कि ख़ला बिन्ते हुकैम रज़ियल्लाहू अन्हा से रिवायत है कि मैंने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फ़रमाते हुए सुना: “जो शख़्स किसी जगह पड़ाव करे और ये दुआ पढ़े: {{ أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّاتِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ}} “अल्लाह के तमाम कलिमात के साथ, उन सब चीज़ों के शर से पनाह मांगता हूँ जिनको उसने पैदा किया” तो उसे कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचा सकती, यहाँ तक कि वो वहाँ से निकल जाए”। [मुस्लिम: 6878]

मस्जिद में दाख़िल होते वक़्त अल्लाह की पनाह में आना, जैसा सय्यदना अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रज़ियल्लाहू अन्हुमा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बयान करते हैं कि जब आप मस्जिद में दाख़िल होते तो ये फ़रमाते थे:

{{ أَعُوذُ بِاللَّهِ الْعَظِيمِ وَبِوَجْهِهِ الْكَرِيمِ وَسُلْطَانِهِ الْقَدِيمِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ}} “मैं अज़मत वाले अल्लाह और उसके करीम चेहरे की और उसकी क़दीम सल्तनत की पनाह चाहता हूँ, मरदूद शैतान से” और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते थे: “जो ऐसा कहे तो शैतान कहता है कि तू मुझसे आज पूरा दिन महफूज़ रहेगा”। [अबू दावूद: 466]

मस्जिद से निकलते वक़्त अल्लाह की पनाह तलब करना, जैसा कि सय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “तुममें से जब कोई शख़्स मस्जिद में दाख़िल हो तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलाम पढ़े और ये दुआ पढ़े: {{اللَّهُمَّ افْتَحْ لِي أَبْوَابَ رَحْمَتِكَ}} “ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़े खोल दे”। और जब मस्जिद से निकले तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलाम पढ़े और ये कहे:

{{ اللَّهُمَّ اعْصِمْنِي مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ}} “ऐ अल्लाह! मुझे शैतान मरदूद के शर से महफूज़ रख”। [इब्ने माजा: 773]

नमाज़ में शैतानी वस्वसों से अल्लाह की पनाह चाहना, जैसा कि सय्यदना उस्मान बिन अबुल आस रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा, ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे और मेरी नमाज़ और क़िरआत के बीच शैतान आ जाता है, वो मुझ पर क़िरआत को गड़मड़ करता है, तो आपने फ़रमाया: “ये शैतान है, जिसे ख़िन्ज़ब कहा जाता है, जब तुम इसके आने को महसूस करो तो इस (के शर) से अल्लाह तआला की पनाह तलब करो (यानीاَعُوْذُ بِاللّٰهِ مِنَ الشَّيْطٰنِ الرَّجِيْمِ   पढ़ो) और तीन बार अपनी बाईं तरफ़ थुतकारो”। उस्मान रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं कि मैंने ऐसा ही किया तो अल्लाह ने इस शैतान को मुझसे दूर कर दिया। [मुस्लिम: 5738, मुसनद अहमद: 17918]

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Monday, September 2, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 6

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 6

ग़ुस्से के वक़्त अल्लाह की पनाह तलब करना, जैसा कि सय्यदना सुलयमान बिन सुरद रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास बैठे हुए थे कि दो आदमियों ने आपस में एक दुसरे को बुरा भला कहना शुरू कर दिया, ऐसा करते हुए उनमें से एक तो इस क़द्र ग़ुस्से में था कि ग़ुस्से की वजह से उसका चेहरा लाल हो गया तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “बेशक मैं एक ऐसा कलिमा जानता हूँ कि अगर ये उसे पढ़ ले तो इसका ग़ुस्सा ख़त्म हो जाए और वो कलिमा ये है: {أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ} सहाबा किराम रज़ियाल्लाहू अन्हुम ने उस शख़्स से कहा, क्या तुमने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान नहीं सुना? उसने जवाब दिया कि मैं पागल नहीं हूँ”। [बुख़ारी: 6115, मुस्लिम: 6646]

बैतूल ख़ला में दाख़िल होते वक़्त अल्लाह की पनाह तलब करना, जैसा कि सय्यदना अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बैतूल ख़ला में दाख़िल होते तो फ़रमाते:

{{اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَائِثِ}} “ऐ अल्लाह! मैं नापाक जिन्नों और नापाक जिन्नियों से तेरी पनाह चाहता हूँ”। [बुख़ारी: 142, मुस्लिम: 831]

सय्यदना ज़ैद बिन अरक़म रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है, कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “ये बैतुल ख़ला (जिन्नों और शैतानों के) हाज़िर होने की जगह है, लिहाज़ा जब तुममें से कोई बैतुल ख़ला में दाख़िल हो तो कहे: {{ أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَائِثِ}} “मैं अल्लाह की पनाह चाहता हूँ नापाक जिन्नों और नापाक जिन्नियों के शर से”। [अबू दावूद: 6]

बीवी से हमबिस्तरी के वक़्त शैतान के शर से अल्लाह की पनाह चाहना, जैसा कि सय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हुमा बयान करते हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “अगर तुममें से कोई शख़्स अपनी बीवी से जमाआ के वक़्त ये दुआ पढ़ ले:

{{بِاسْمِ اللَّهِ اللَّهُمَّ جَنِّبْنِي الشَّيْطَانَ وَجَنِّبْ الشَّيْطَانَ مَا رَزَقْتَنَا}} “अल्लाह के नाम के साथ, ऐ अल्लाह! हमें शैतान के शर से महफूज़ रख और हमें तू जो औलाद अता फ़रमाए उसे भी शैतान से बचाना” तो अगर इस मिलाप से बच्चा पैदा होगा तो शैतान उसे कभी नुक़सान न पहुँचा सकेगा”। [बुख़ारी: 5165, मुस्लिम: 3533]

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Friday, August 30, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 5

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 5


 اَعُوْذُ بِاللّٰهِ مِنَ الشَّيْطٰنِ الرَّجِيْمِ    

“मैं पनाह मांगता हूँ अल्लाह की शैतान मरदूद से”

अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम में कई जगह बन्दों को शैतान के शर से पनाह मांगने का हुक्म दिया है, जैसा कि इरशाद फ़रमाया:

فَاِذَا قَرَاْتَ الْقُرْاٰنَ فَاسْتَعِذْ بِاللّٰهِ مِنَ الشَّيْطٰنِ الرَّجِيْمِ

“तो जब तू क़ुरआन पढ़े तो मरदूद शैतान से अल्लाह की पनाह तलब कर”।  [अन-नहल: 98] और फ़रमाया:

وَاِمَّا يَنْزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطٰنِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللّٰهِ ۭاِنَّهٗ سَمِيْعٌ عَلِيْمٌ

“और अगर कभी शैतान की तरफ़ से कोई उकसाहट तुझे उभार ही दे तो अल्लाह की पनाह तलब कर, बेशक वो सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है”। [अल-आराफ़: 200] और फ़रमाया:

وَ قُلْ رَّبِّ اَعُوْذُ بِكَ مِنْ هَمَزٰتِ الشَّیٰطِیْنِۙ۝۹۷ وَ اَعُوْذُ بِكَ رَبِّ اَنْ یَّحْضُرُوْنِ۝۹۸

“और तू कह ऐ मेरे रब! मैं शैतानों की उकसाहटो से तेरी पनाह मांगता हूँ और ऐ मेरे रब! मैं इससे भी तेरी पनाह मांगता हूँ कि वो मेरे पास आ मौजूद हो”। [अल-मुमिनून: 97,98] 

इन आयतों में अल्लाह तआला ने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शैतान मरदूद से पनाह मांगने का हुक्म दिया है, क्यूंकि शैतान इंसान का ऐसा बुरा दुशमन है जो किसी भी भलाई और अहसान को नहीं मानता और हर वक़्त इसके ख़िलाफ़ साज़िश में लगा रहता है। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीसों से भी इसका सबूत मिलता है। सहीह हदीसों में शैतान मरदूद के शर से पनाह मांगने के कुछ जगहें निम्नलिखित हैं:

नमाज़ शुरू करते वक़्त शैतान के शर से पनाह तलब करना, जैसा कि सय्यदना अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब रात को क़याम करते तो नमाज़ शुरू करते हुए “अल्लाहु अकबर” कहते, फिर ये पढ़ते: { سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ وَتَبَارَكَ اسْمُكَ وَتَعَالَى جَدُّكَ وَلَا إِلَهَ غَيْرَكَ} “मैं पाकी बयान करता हूँ तेरी ऐ अल्लाह! तेरी ही हम्द व सना के साथ, तेरा नाम बहुत बरकत वाला है, तेरी शान बहुत बुलंद व बाला है और तेरे सिवा कोई और इबादत के लायक़ नहीं”। फिर आप तीन बार “ला इलाहा इल्लल्लाह” पढ़ते, फिर ये पढ़ते: {{أَعُوذُ بِاللَّهِ السَّمِيعِ الْعَلِيمِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ مِنْ هَمْزِهِ وَنَفْخِهِ}} “मैं अल्लाह की पनाह लेता हूँ जो सुनने वाला, जानने वाला है शैतान मरदूद से यानी उसके वस्वसे से और उसकी फूँक और उसके जादू से”। [मुसनद अहमद: 11479, अबू दावूद: 775, तिरमिज़ी: 242]

सय्यदना अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कहा करते थे:

{{اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ، وَهَمْزِهِ وَنَفْخِهِ وَنَفْثِهِ}} “ऐ अल्लाह! बेशक मैं तेरी पनाह लेता हूँ शैतान मरदूद से और उसके वस्वसे से, उसके तकब्बुर और उसके जादू से”। [इब्ने माजा: 808]

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Thursday, August 29, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 4

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 4

इमाम के पीछे भी सूरह फ़ातिहा ज़रूरी है, जैसा कि सय्यदना उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहू अन्हु रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि ने फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाई और आपके लिए क़ुरआन की तिलावत मुश्किल हो गई। जब नामाज़ से फ़ारिग़ हुए तो फ़रमाया: “शायद तुम अपने इमाम के पीछे क़िरात किया करते हो”? हमने कहा, हाँ, ऐ अल्लाह के रसूल! आपने फ़रमाया: “सिवाय फ़ातिहा के और कुछ न पढ़ा करो, क्यूंकि उस शख़्स की नमाज़ नहीं होती जो सूरह फ़ातिहा न पढ़ें। [तिरमिज़ी: 311, अबू दावूद: 823]

सय्यदना उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “मैं सोचता था कि क़ुरआन का पढ़ना मुझ पर दुशवार क्यों होता है (फिर मैंने जान लिया कि तुम्हारे पढ़ने की वजह से दुशवार हुआ) तो जब में जहरन पढ़ूं (जहरी नमाज़ में) तो क़ुरआन से सूरह फ़ातिहा के सिवा कुछ भी न पढो”। [अबू दावूद: 824]

सय्यदना अबू हुरैरा रज़ियाल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “जिस शख़्स ने नमाज़ पढ़ी और इसमें सुरह फ़ातिहा न पढ़ी तो वो (नमाज़) अधूरी है, अधूरी है, नामुकम्मल है”। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु से पूछा गया कि हम इमाम के पीछे होते हैं (तो क्या फिर भी पढ़ें)? तो अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु ने कहा, (हाँ)! तब तू इसको दिल में पढ़। [मुस्लिम: 878]

सय्यदना अनस रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबा को नामज़ पढ़ाई, फ़ारिग़ होकर उनकी तरफ़ तवज्जो देकर पूछा: “क्या तुम अपनी नामाज़ में इमाम की क़िरात के दौरान में कुछ पढ़ते हो”? सब ख़ामोश रहे, तीन बार आपने उनसे यही पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया, जी हाँ! हम ऐसा करते हैं, आपने फ़रमाया: “ऐसा न किया करो, बल्कि तुम सिर्फ़ सुरह फ़ातिहा दिल में पढ़ लिया करो”। [इब्ने माजा: 1844, सुनन कुबरा लिलबैहक़ी: 2/166]

इन सहीह हदीसों से हर नमाज़ी के लिए हर नमाज़ में सूरह फ़ातिहा पढ़ना ज़रूरी है, नमाज़ी चाहे इमाम हो, या मुक़तदी, या अकेला, अगर वो सुरह फ़ातिहा नहीं पढ़ेगा तो उसकी नमाज़ नहीं होगी।

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Wednesday, August 28, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 3

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 3

तौरात व इंजील और क़ुरआन मजीद में सुरह फ़ातिहा जैसी कोई सूरत नहीं, जैसा कि सय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु रिवायत हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि ने उबई बिन कआब रज़ियल्लाहू अन्हु से फ़रमाया: “क्या तुम इस बात को पसंद करते हो कि मैं तुम्हें एक ऐसी सूरत सिखाऊँ कि इस जैसी सूरत न तौरात में नाज़िल हुई, न ज़बूर में, न इंजील में और न क़ुरआन में”। उबई बिन कआब रज़ियल्लाहू अन्हु ने कहा, हाँ! ऐ अल्लाह के रसूल! रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम इस दरवाज़े से न निकलने पाओगे कि वो तुम्हें सिखा दी जाएगी”। सय्यदना उबई रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं, फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझसे बात करने लगे, मैंने धीरे धीरे चल रहा था, इस डर से कि कहीं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बात ख़त्म करने से पहले (दरवाज़े पर) न पहुँच जायें। जब हम दरवाज़े के क़रीब पहुँचे तो मैंने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल! वो कौन सी सूरत है जिसके बताने का आपने मुझसे वादा किया था? रसूलुल्लाह सल्लालाल्हू अलैहि ने फ़रमाया: “तुम नमाज़ में क्या पढ़ते हो”? सय्यदना उबई रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं, मैंने सूरह फ़ातिहा पढ़ कर सुनाई। रसूलुल्लाह सल्लाल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: “उस ज़ात की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है! अल्लाह ने इस सूरत की जैसी न तौरात में कोई सूरत नाज़िल की, न इंजील में, न ज़बूर में और न फ़ुरक़ान (क़ुरआन) में और बेशक वो सबअ मसानी है”। [मुसनद अहमद: 9364, तिरमिज़ी: 2875]

हर नमाज़ की हर रकात में सूरह फ़ातिहा पढ़ना वाजिब है, जैसा कि सय्यदना उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि ने फ़रमाया: “जो शख़्स सुरह फ़ातिहा न पढ़े उसकी नमाज़ ही नहीं होती”। [बुख़ारी: 756, मुस्लिम: 874]

हर रकात में सूरह फ़ातिहा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि का तरीक़ा था, जैसा सय्यदना अबू क़तादा रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं, बेशक नबी सल्लल्लाहु अलैहि ज़ुहर की पहली दो रकातों में सूरह फ़ातिहा और दो सूरतें पढ़ते थे और आख़िरी दो में सिर्फ़ सूरह फ़ातिहा पढ़ते थे। [बुख़ारी: 776]

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Tuesday, August 27, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 2

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 2


इस सूरह करीमा के पढ़ कर फूँकने से यानी दम से साँप आदि के ज़हर का असर अल्लाह के हुक्म से ख़त्म हो जाता है, जैसा कि सय्यदना अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाह अन्हु बयान करते हैं कि अरब के एक क़बीले के पास से कुछ सहाबा का गुज़र हुआ, क़बीले वालों ने सहाबा की मेहमान नवाज़ी से इन्कार कर दिया, इसी दौरान में उनके सरदार को बिच्छू (या साँप) ने काट लिया, क़बीले वालों से सहाबा से कहा, तुम्हारे पास कोई दवा हो, या तुम लोगों में कोई दम झाड़ करने वाला शख़्स हो? सहाबा ने कहा, तुमने हमारी मेहमान नवाज़ी नहीं की, लिहाज़ा जब तक तुम हमें कुछ माल न दोगे हम इलाज नहीं करेंगे। इस पर उन लोगों ने कुछ बकरियाँ देने का वादा किया तो एक शख़्स ने सुरह फ़ातिहा पढ़नी शुरू की और साथ साथ वो थूक जमा करता और (काटने वाली जगह पर) थुतकारता जाता, तो इस तरह सरदार अच्छा हो गया, वो बकरियाँ ले कर आये तो कुछ सहाबा ने कहा, हम बकरियाँ नहीं लेंगे, जब तक कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछ न लें, वापसी पर उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि से पूछा, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि इस पर मुस्करा दिये और इस शख़्स से फ़रमाया: “तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि ये सूरत रुक़्या (दम) है? (तुमने ठीक किया) ये बकरियाँ ले लो और अपने साथ मेरा भी हिस्सा निकालो”। [बुख़ारी: 5736, मुस्लिम: 5733]

इस हदीस से मालूम हुआ कि सुरह फ़ातिहा रुक़्या है, इसके ज़रिये से दम करके इलाज किया जा सकता है और वाज़ेह हुआ कि ज़रुरत के वक़्त क़ुरआन मजीद पर उजरत (मेहनताना) लेना जायज़ है। सहाबा किराम रज़ियल्लाहू अन्हुम ने उजरत इसलिये मांगी थीं क्यूंकि बस्ती वालों ने उनकी मेहमान नवाज़ी से इन्कार कर दिया था, लिहाज़ा जायज़ दम करना और इसकी उजरत लेना जायज़ है लेकिन इसे एक हमेशा के लिए पेशा बना लेना साबित नहीं, फिर बिना मतलब वाले अलफ़ाज़ से तावीज़ लिखना, उन्हें पानी में घोल कर पिलाना, गले में लटकाना या किसी दूसरी जगह बाँधना, तो ऐसे काम शरअन हराम हैं।

सुरह फ़ातिहा ही नमाज़ है, जैसा कि सय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु बयान करते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ये फ़रमाते हुए सुना, आप फ़रमा रहे थे: “अल्लाह तआला फ़रमाता है कि मैंने नमाज़ को अपने और अपने बन्दे के बीच दो हिस्सों में बाँट दिया है और मेरे बन्दे के लिए वो कुछ है जिसका वो सवाल करे, बन्दा जब कहता है: { اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِيْنَ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, मेरे बन्दे ने मेरी तारीफ़ की है और जब कहता है: { الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है मेरे बन्दे ने मेरी सना की है और जब कहता है: { مٰلِكِ يَوْمِ الدِّيْنِ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, मेरे बन्दे ने मेरी बुज़ुर्गी बयान की और यूँ भी फ़रमाता है कि मेरे बन्दे ने (अपना मामला) मेरे सुपुर्द कर दिया। बन्दा जब कहता है: { اِيَّاكَ نَعْبُدُ وَاِيَّاكَ نَسْتَعِيْنُ} तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, ये मेरे और मेरे बन्दे के बीच है और मेरे बन्दे के लिए वो कुछ है जिसका वो सवाल करे और जब बन्दा ये कहता है:

}  اِھْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَـقِيْمَ Ĉ۝ۙصِرَاطَ الَّذِيْنَ اَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ ۹ غَيْرِ الْمَغْضُوْبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّاۗلِّيْنَ{

तो अल्लाह तआला फ़रमाता है, ये मेरे बन्दे के लिए है और मेरे बन्दे के लिए वो कुछ है जिसका वो सवाल करे”। [मुस्लिम: 878]

जारी है...................................


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Monday, August 26, 2024

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 1

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم●


🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃


📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒


✒️ लेख़क: अबू नोमान सैफ़ुल्लाह ख़ालिद 


🖋️ तर्जुमा: मोहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)


🌺🍀🍁 सूरह फ़ातिहा 🌺🍀🍁


➡️ भाग 1


सुरह फ़ातिहा के शाने नुज़ूल के बारे में सय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हुमा बयान करते हैं, एक दिन जिब्रील अलैहिस्सलाम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास बैठे हुए थे, उन्होंने अपने ऊपर की तरफ़ से बड़े ज़ोर से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनी, उन्होंने अपना सर उठाया और फ़रमाया: “आज आसमान का वो दरवाज़ा खुला है, जो इससे पहले कभी नही खुला था और इससे एक फ़रिश्ता उतरा है”। फिर फ़रमाया: “इस दरवाज़े से ये फ़रिश्ता ज़मीन पर उतरा है, ये आज के दिन से पहले कभी नहीं उतरा”। इस फ़रिश्ते ने (रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को) सलाम किया और कहा: “आपको इन दो नूरों की ख़ुशख़बरी हो जो आपको इनायत हुए हैं ये आप से पहले किसी नबी को अता नहीं हुए, इनमें से एक सुरह फ़ातिहा है और दूसरा नूर सुरह बक़रह की आख़िरी आयतें। आप जब भी इन दोनों में से कोई हर्फ़ तिलावत करेंगें तो आपको मांगी हुई चीज़ ज़रूर अता कर दी जाएगी”। [मुस्लिम: 1877]

सुरह फ़ातिहा क़ुरआन मजीद की सबसे ज़्यादा अज़मत वाली सूरत है, जैसा कि सय्यदना अबू सईद बिन मुअल्ला रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं कि मैं मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहा थे कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे बुलाया, मैं उसी वक़्त हाज़िर न हुआ (बल्कि नमाज़ पढ़ कर गया) और कहा कि या रसूलुल्लाह! मैं नमाज़ पढ़ रहा था (इस वजह से देर हुई) तो आपने फ़रमाया: “क्या अल्लाह ने ये नहीं फ़रमाया: { اسْتَجِيْبُوْا لِلّٰهِ وَلِلرَّسُوْلِ اِذَا دَعَاكُمْ } तुम अल्ल्लाह की और रसूल की दावत क़ुबूल करो, जब वो तुम्हें बुलाएं”। [अनफ़ाल: 24] फिर मुझसे फ़रमाया: तेरे मस्जिद से बाहर जाने से पहले तुझे क़ुरआन की एक ऐसी सूरत बताऊंगा जो (अज्र व सवाब में) सारी सूरतों से बढ़ कर है”। फिर आपने मेरा हाथ पकड़ लिया, जब आपने बाहर आने का इरादा किया तो मैंने कहा कि या रसूलुल्लाह! क्या आपने ये नहीं फ़रमाया था कि मैं तुमको एक सूरत बतलाऊँगा जो क़ुरआन की सब सूरतों से बढ़ कर है? आपने फ़रमाया: “वो सूरत { اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِيْنَ} है। यही सबअ मसानी (यानी सात आयतें हैं जो बार बार दोहराई जाती हैं) और क़ुरआन ए अज़ीम है जो मुझे दिया गया है”। [बुख़ारी: 4474]                                


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Saturday, May 15, 2021

Surah Az-Zukhruf (43)

 

Surah Az-Zukhruf (43)

Aayat 1 -4

حمٓ ١  وَٱلۡكِتَٰبِ ٱلۡمُبِينِ ٢  إِنَّا جَعَلۡنَٰهُ قُرۡءَٰنًا عَرَبِيّٗا لَّعَلَّكُمۡ تَعۡقِلُونَ ٣ وَإِنَّهُۥ فِيٓ أُمِّ ٱلۡكِتَٰبِ لَدَيۡنَا لَعَلِيٌّ حَكِيمٌ ٤

 

“{ حمٓ } Is kitãb Ki Qasam Jo kholkar bayãn karne wãli hai. Beshak humne ise arbi Qurãn banãya, taake tum samjho. aur beshak woh hamãre paas asal kitãb mein yaqeenan bahot buland, kamãl hikmat wãla hai.”

 

Allah tãla ne farmãya hai ki Ae ahl e arab! is kitãb e mubeen ki qasam,  jo haq o bãtil ko logon ke liye khol kar bayãn karti hai! use ham ne Arabi zuban mein nãzil kiya hai, tãke tum log iske igraaz o maqãsid ka idrãk kar sako  aur samajh sako ke hamãra tumse kya mutãliba hai. Agar Qurãn majeed arabi zubaan mein Na hota to ahl e arab bahãna banãte ki ham ise kaise samjhein? jaisa ke irshãd farmãya:

وَلَوۡ جَعَلۡنَٰهُ قُرۡءَانًا أَعۡجَمِيّٗا لَّقَالُواْ لَوۡلَا فُصِّلَتۡ ءَايَٰتُهُۥٓۖ ءَا۬عۡجَمِيّٞ وَعَرَبِيّٞۗ

Aur agar ham ise ajmi Qurãn Bana dete to yaqeenan woh kehte iski aayat kholkar kyon Na bayãn ki gayeen, kya ajmi zuban aur Arabi (rasul)?” [Surah Fussilat # 41:44]

 

Agli ãyat mein farmãya ki ye qurãn mubeen hamãre paas loh e mehfooz mein maujood hai, uska muqaam bahot hi uncha hai aur yeh badi hikmaton wãli kitãb hai jaisa ke Allah tãla ne farmãya:

إِنَّهُۥ لَقُرۡءَانٞ كَرِيمٞ ٧٧  فِي كِتَٰبٖ مَّكۡنُونٖ ٧٨ لَّا يَمَسُّهُۥٓ إِلَّا ٱلۡمُطَهَّرُونَ ٧٩  تَنزِيلٞ مِّن رَّبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ ٨٠

“Ke bilãshuba yeh yaqeenan ek ba izzat padhi jaane wali cheez hai. ek aisi kitãb mein Jo chhupa kar Rakhi hui hai. ise koi haath naheen lagãta magar jo bahot paak kiye hue hain. Tamãm jahãnon ke rab ki taraf se utãri hui hai.” [Al-Waqi'a  # 56: 77 to 80] aur farmãya:

 كَلَّآ إِنَّهَا تَذۡكِرَةٞ ١١  فَمَن شَآءَ ذَكَرَهُۥ ١٢ فِي صُحُفٖ مُّكَرَّمَةٖ ١٣  مَّرۡفُوعَةٖ مُّطَهَّرَةِۢ ١٤  بِأَيۡدِي سَفَرَةٖ ١٥  كِرَامِۢ بَرَرَةٖ ١٦

Aisa hargiz  Naheen chãhiye. Yeh (Qurãn) to ek nasihat hai. jo chãhe ise qubool kar le. aise sahifo mein hai jin ki izzat ki jaati hai. Jo buland kiye hue, paak kiye hue hain. aise likhne Wãle ko haathon mein hain. Jo muãzziz hain, nek hain.” [Abãsa # 80: 11 to 16]

Aayat 5-8

أَفَنَضۡرِبُ عَنكُمُ ٱلذِّكۡرَ صَفۡحًا أَن كُنتُمۡ قَوۡمٗا مُّسۡرِفِينَ ٥ وَكَمۡ أَرۡسَلۡنَا مِن نَّبِيّٖ فِي ٱلۡأَوَّلِينَ ٦ وَمَا يَأۡتِيهِم مِّن نَّبِيٍّ إِلَّا كَانُواْ بِهِۦ يَسۡتَهۡزِءُونَ ٧ فَأَهۡلَكۡنَآ أَشَدَّ مِنۡهُم بَطۡشٗا وَمَضَىٰ مَثَلُ ٱلۡأَوَّلِينَ ٨

“To kya ham tumse is nasihat ko hata len, airãz karte hue, is wajah se ki tum had se badhne wãle log ho.  aur kitne hi Nabi ham ne pehle logon mein bheje. aur unke paas koi Nabi naheen aata tha magar woh uska mazaak udãe the. to hamne unse ziyãda sakht pakad wãlon ko halaak kar diya aur pehle logon ki misaal guzar chuki.”

 

Kuffãr makka ke kufr o shirk par israr aur Qurãn majeed se musalsal aerãz per nakeer karte hue kaha ja raha hai, kya tum yeh samajhte ho ke tumhãri  ziyãdattiyo  aur had se tajãwuz ki wajah se ham Qurãn ka nãzil karna band kar denge?  balke tumhãra  haq se airãz to aur is baat ka taqaza karta hai k Qãran nãzil hota rahe, shãyad ke kisi din tumhãre dil mein haq baat utar jaaye, tum musharraf ba islãma ho jão aur tumhãre dil Ki duniya badal jaaye jaisa ke irshãd farmãya:

فَإِنَّمَا يَسَّرۡنَٰهُ بِلِسَانِكَ لِتُبَشِّرَ بِهِ ٱلۡمُتَّقِينَ وَتُنذِرَ بِهِۦ قَوۡمٗا لُّدّٗا ٩٧

So Uske Siwa kuchh Naheen ke hamne use Teri zubaan mein asaan kar diya hai, tãki tu uske sath mutaqqi logon ko khushkhabari de aur uske sath un logon ko  darãye Jo sakht jhagddãlu Hain.” [Maryam # 19: 97]

 

Agli ãyat mein kufãr ko Mazeed farmãya ke tumhãri taraf se hamãre Nabi aur Qurãn ka inkaar koi nayi baat Naheen, ham tum se pehle bhi bahot se ambiya bhejte rahe hain aur unki qaumon ne unka mazaak udãya, unki nabuwaton aur Allah Ki kitãbon ka inkar Kiya to hamne unmein se jo sabse ziyãda tãqatvar qaume thi unhen azaab bhej kar halaak kar diya aur qaumon ke wãqiyãt aur unki halãkat o tabãhi ki ruwdade Qurãn kareem mein mukhtalif muqãmãt par mazkoor hain, jinhen sunkar tumhen ibrat hãsil Karni chãhiye, lekin afsos hai ki baad wãle unse ibrat hãsil  naheen karte,  jaisa ki irshãd farmãya:

أَفَلَمۡ يَسِيرُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَيَنظُرُواْ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡۚ كَانُوٓاْ أَكۡثَرَ مِنۡهُمۡ وَأَشَدَّ قُوَّةٗ وَءَاثَارٗا فِي ٱلۡأَرۡضِ فَمَآ أَغۡنَىٰ عَنۡهُم مَّا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ ٨٢ فَلَمَّا جَآءَتۡهُمۡ رُسُلُهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِ فَرِحُواْ بِمَا عِندَهُم مِّنَ ٱلۡعِلۡمِ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُواْ بِهِۦ يَسۡتَهۡزِءُونَ ٨٣

To kya woh zameen mein chale phire Naheen Ki dekhte un logon Ka anjaam Kaisa hua jo inse pehle the, woh (tãdãd mein) inse ziyãda the aur quwwat mein aur zameen mein yaadgaaron ke aitbaar se inse badh kar the, Tu unke Kisi kaam Na Aaya, Jo woh kamãte the. phir jab unke rasool ke paas waaze daleel lekar aaye to woh us par bhool Gaye Jo unke paas kuchh ilm tha aur unhen us cheez ne gher liya jiska woh mazaaq udãte the.” [Ghhãfir # 40: 82 & 83]

Aayat 9 – 10

وَلَئِن سَأَلۡتَهُم مَّنۡ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ لَيَقُولُنَّ خَلَقَهُنَّ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡعَلِيمُ ٩ ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلۡأَرۡضَ مَهۡدٗا وَجَعَلَ لَكُمۡ فِيهَا سُبُلٗا لَّعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ ١٠  

“Aur bilãshubah agar tu unse pochhe ke aasmãnon ko aur zameen ko kisne paida Kiya to yaqeenan zaroor kahenge ki unhe sab par ghhãlib, sab kuchh jaane wãle ne paida Kiya hai. woh jis ne tumhãre liye zameen ko bichhona banãya aur us mein tumhãre liye rãste banãye, tãke tum Raha pão.”

 

Mushrikeen e makka ke liye dãwat tauheed ka dawa karte hue kaha ja raha hai ke ae mere Nabi! agar aap unse poochhenge ki aasmãnon aur zameen ko kisne paida Kiya hai to baghhair Kisi tawaquf o taradud ke yahi jawaab denge ke unhen  usne paida kiya hai jo bade muqaam o izzat wãla hai aur jiska ilm har cheez ko muheet hai.

 

Agli ãyat mein farmãya ke logon! us azeez o aleem zaat ki sifat yeh bhi hai ke usne zameen ko tumhãre liye hamwãr  aur ãrãmdah banãya hai, jis per tum chalte ho, sote ho aur apni tamãm zaruriyãt e zindagi puri karte ho. usi ne tumhãre liye zameen par pahãdon aur wãdiyo ke darmiyãn rãste banãe Hain,  tãke tum un par chalkar ek jagah se doosri jagah muntaqil ho sako aur apni maeshat ke liye tijãrati kãrobaar anjaam de sako.

مَّنۡ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ لَيَقُولُنَّ خَلَقَهُنَّ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡعَلِيمُ

Yãni woh aitraaf karenge ki unka khãliq to Allah wahda la shareeka lahu hai, Uske bãwajood uske saath buton aur shareekon ki ibãdat karte hain. irshãd farmãya:

وَلَئِن سَأَلۡتَهُم مَّنۡ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُۚ قُلۡ أَفَرَءَيۡتُم مَّا تَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ إِنۡ أَرَادَنِيَ ٱللَّهُ بِضُرٍّ هَلۡ هُنَّ كَٰشِفَٰتُ ضُرِّهِۦٓ أَوۡ أَرَادَنِي بِرَحۡمَةٍ هَلۡ هُنَّ مُمۡسِكَٰتُ رَحۡمَتِهِۦۚ قُلۡ حَسۡبِيَ ٱللَّهُۖ عَلَيۡهِ يَتَوَكَّلُ ٱلۡمُتَوَكِّلُونَ ٣٨

Aur yaqeenan agar tum unse puchho ke aasmãnon ko aur zameen ko kisne paida Kiya hai To zaroor hi kahenge ke Allah ne.  keh to kya Tumne Dekha ke woh hastiyãn jinhne tum Allah ke siwa pukãrte ho, agar Allah mujhe koi nuqsaan pahunchãne Ka irãda Kare to kya woh uske nuqsaan ko hatãne Wãli hai?  ya woh mujh par koi meherbãni karna chãhe to kya woh uski rehmat ko rokãne wãli Hain?  keh de mujhe Allah hi kaafi hai,  usi par bharosa Karne Wãle bharosa karte Hain.” [Az-Zumar # 39: 38]

Aayat 11

وَٱلَّذِي نَزَّلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءَۢ بِقَدَرٖ فَأَنشَرۡنَا بِهِۦ بَلۡدَةٗ مَّيۡتٗاۚ كَذَٰلِكَ تُخۡرَجُونَ ١١

“Aur Jisne aasmãn se ek andãze ke saath pani utãra, phir ham ne uske saath ek murda shehar ko zinda kar diya, isi Tarah tum nikãle jaaoge.”

 

Yãni Allah tãla ki yeh sifat bhi hai ke woh aasmãn se Apni hikmat o maslihat ke taqãze ke mutãbiq munãsib miqdaar mein bãrish nãzil karta hai,  jis se woh murda shehron ko zindagi deta hai. aakhir mein farmãya ke jis Tarah bãrish ke Qatron se murda zameen mein Jaan ãjaati hai, paude lahlaha uthte Hain aur unwa o aqsaam ke phal aur phool ug ãte Hain, usi tarah Allah tãla qayãmat ke din tamãm murda insãnon ko dobãra zinda karega, Jo zinda hote hi maidãn e mehshar ki taraf daud padenge aur apne Rab ke huzoor Apne Amal ka hisaab dene ke liye dast basta khade ho jãenge, jaisa ke irshãd farmãya:

وَنَزَّلۡنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ مُّبَٰرَكٗا فَأَنۢبَتۡنَا بِهِۦ جَنَّٰتٖ وَحَبَّ ٱلۡحَصِيدِ ٩  وَٱلنَّخۡلَ بَاسِقَٰتٖ لَّهَا طَلۡعٞ نَّضِيدٞ ١٠ رِّزۡقٗا لِّلۡعِبَادِۖ وَأَحۡيَيۡنَا بِهِۦ بَلۡدَةٗ مَّيۡتٗاۚ كَذَٰلِكَ ٱلۡخُرُوجُ ١١

Aur humne aasmãn se ek bahot ba barkat Paani utãra,  phir hamne uske saath bãghhãt aur kaati jaane wãli (kheti) ke daane ugãye. aur khajooron ke darakht lambe lambe, jinke taeh ba taehe khoshe hain.  bandon ko rozi dene ke liye aur hamne uske saath ek murda shahar ko zinda Kar Diya, isi Tarah nikalna hai.” [Qaf # 50: 9 to 11]

Aayat 12 to 14

وَٱلَّذِي خَلَقَ ٱلۡأَزۡوَٰجَ كُلَّهَا وَجَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلۡفُلۡكِ وَٱلۡأَنۡعَٰمِ مَا تَرۡكَبُونَ ١٢ لِتَسۡتَوُۥاْ عَلَىٰ ظُهُورِهِۦ ثُمَّ تَذۡكُرُواْ نِعۡمَةَ رَبِّكُمۡ إِذَا ٱسۡتَوَيۡتُمۡ عَلَيۡهِ وَتَقُولُواْ سُبۡحَٰنَ ٱلَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُۥ مُقۡرِنِينَ ١٣ وَإِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ ١٤

Aur woh jisne sab ke sab jode paida Kiya aur tumhãre liye woh kashtiyãn aur chaupãye banãye Jin par tum sawaar hote ho. Tãke tum unke peethon par jamkar baitho, phir Apne Rab ki nemat yaad karo, jab un par jamkar baith jão aur kaho Paak hai woh jisne ise hamãre liye  ta’abe Kar Diya, Hãlãnke ham ise qãbo mein laane wãle Naheen the. aur beshak ham Apne Rab ki taraf zarur laut kar jaane Wãle Hain.”

 

Allah tãla ki ek sifat yeh bhi hai ki usne anwa o iqsam ki cheezen aur tamãm hawãnãt o nabatãt ke jode paida kiye Hain, sirf uski zaat akeli zaat hai, uska koi joda naheen hai. usi ne insaan ko kashti banãne ka ilm Diya aur usi ke liye chaupãye paida Kiye, logo in kashtiyon aur chaupãyon par sawaar hokar Safar karte Hain. Ahl e aql o khurd aur ahl e imaan jab in kashtiyon aur chaupãyon par Sawaar hote Hain to Apne rab ke hamd o sana byãn karte Hain ki jisne in  jãnwaron ko unke ta’abe farmãn bana Diya hai. agar Allah na Chãhata to unhen woh maskhar naheen kar sakte the. Log sawaar hokar is haqeeqat ka aitraaf taraf karte Hain ke is duniyãwi zindagi ke baad hamen laut kar Apne rab ke paas Jãna hai.

Sawãriyon ka ehsaan jatlãte hue Allah tãla ne irshãd farmãya:

وَٱلۡخَيۡلَ وَٱلۡبِغَالَ وَٱلۡحَمِيرَ لِتَرۡكَبُوهَا وَزِينَةٗۚ وَيَخۡلُقُ مَا لَا تَعۡلَمُونَ ٨

Aur ghode aur khachchar aur gadhe, tãke tum un par sawar ho aur zeenat ke liye, aur woh paida Karega jo tum Naheen jãnte.” [An-Nahl  # 16: 8] Aur faramãya:

ٱللَّهُ ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلۡأَنۡعَٰمَ لِتَرۡكَبُواْ مِنۡهَا وَمِنۡهَا تَأۡكُلُونَ ٧٩ وَلَكُمۡ فِيهَا مَنَٰفِعُ وَلِتَبۡلُغُواْ عَلَيۡهَا حَاجَةٗ فِي صُدُورِكُمۡ وَعَلَيۡهَا وَعَلَى ٱلۡفُلۡكِ تُحۡمَلُونَ ٨٠ وَيُرِيكُمۡ ءَايَٰتِهِۦ فَأَيَّ ءَايَٰتِ ٱللَّهِ تُنكِرُونَ ٨١

Allah woh  hai jisne tumhãre liye chaupãye banãye, tãke unme se baaz par tum sawaar ho aur unhi mein se baaz ko tum khãte ho. aur tumhãre liye unme bahot fãyde hain aur tãke tum un par us hãjat tak pahuncho Jo tumhãre seeno mein hai aur unhi par aur kashtiyon par tum sawaar kiye jaate ho. aur woh tumhen apni nishãniyãn dikhãta hai, phir tum Allah ki kaun kaun si nishãniyo ka inkaar karoge.” [Ghhãfir # 40: 79 to 81]

 

Ali bin Rabia bayãn karte Hain kis Saiyyadna Ali (Razi Allahu anhu) jab apni sawãri par sawaar hone lage to aap ne rikab mein pair rakhte hue farmãya: {  بِسْمِ اللَّهِ } phir jab jam kar baith Gaye to farmãya { الْحَمْدُ لِلَّهِ } phir Kaha:

{ ‏‏‏‏ سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ ‏‏ وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنْقَلِبُونَ ‏‏‏‏ }

“Paak hai woh zaat jisne ise hamãre ta’abe Kiya aur ham az khud ise apna ta’abe Naheen bana sakte the aur bilãshubah ham Apne Rab hi ki taraf laut jaane Wãle Hain.” Phir teen martaba

{ الْحَمْدُ لِلَّهِ } kaha teen martaba { اللَّهُ أَكْبَرُ } phir farmãya:

{ سُبْحَانَكَ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ } “Ae Allah tu paak hai, maine apni Jaan par zulm Kiya hai, tu mujhe maaf farma de, bilãshubah tere Siwa aur koi naheen Jo gunãhon ko baksh sake.” aur phir Hans diye. maine poochha, ameerul momineen! aap kis baat par hanse Hain?  unhone batãya ke maine Allah ke Rasool () ko Dekha ki apne aise hi kiya tha jaise maine kiya hai aap phir aap Hans diye the,  to Maine Allah ke Rasool () se poocha tha  ae Allah ke rasool! aap kis baat per hanse hain? to apne farmãya: “bilãshubah tere rab ko Apne bande par tãjub ãta hai jab woh kahta hai: { رَبِّ اغْفِرْ لِي } “mere Rab! mujhe baksh de” to (Allah tãla farmãta hai ke) mera Banda jaanta hai ki mere Siwa koi gunãhon ko baksh Naheen Sakta.” [Abu Dãwood 2602, Tirmizi 3446]

 

Saiyyadna Abdullah bin Umar (Razi Allahu anhu) bayãn karte Hain ke Nabi Karim ﷺ Safar ke liye jab Kabhi apni sawãri par sawaar hote to teen matarba takbeer keh kar yeh dua padhte:

سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا، وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ، وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنْقَلِبُونَ، اللهُمَّ إِنَّا نَسْأَلُكَ فِي سَفَرِنَا هَذَا الْبِرَّ وَالتَّقْوَى، وَمِنَ الْعَمَلِ مَا تَرْضَى، اللهُمَّ هَوِّنْ عَلَيْنَا سَفَرَنَا هَذَا، وَاطْوِ عَنَّا بُعْدَهُ، اللهُمَّ أَنْتَ الصَّاحِبُ فِي السَّفَرِ، وَالْخَلِيفَةُ فِي الْأَهْلِ، اللهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ وَعْثَاءِ السَّفَرِ، وَكَآبَةِ الْمَنْظَرِ، وَسُوءِ الْمُنْقَلَبِ فِي الْمَالِ وَالْأَهْلِ

“Paak hai woh jisne ise  hamãre liye taa’be Kar Diya, hãlãnki ham ise qãbu mein laane wãle Naheen the aur beshak ham apne Rab ki taraf zarur laut kar jaane Wãle Hain. Ae Allah! ham Apne is Safar mein tujhse neki aur taqwa Ka sawaal karte hain aur is amal ka sawaal karte Hain, jise tu Pasand Kare. Ae Allah! hamãra yeh Safar ham par aasãn farma de aur ham se iski duri kam kar de. Ae Allah! tu hi safar mein saathi aur ghar wãlon mein naaib hai, ae Allah!  main tujhse Safar ki mushaqat se aur Maal aur ahl e khãna mein ghamnaak manzar dekhne se aur nãkaam lautne  ki burai se Teri panãh chãhata hoon.” aur jab wãpas aate to yahi kalimaat kahte, Albatta in alfaaz ke izãfe ke saath.

{ آيِبُونَ تَائِبُونَ عَابِدُونَ لِرَبِّنَا حَامِدُونَ } “ham wãpas lautne Wãle, tauba Karne Wãle, ibãdat Karne Wãle aur apne Rab hi ki hamd Karne Wãle Hai.” [Muslim 1342]

Aayat 15

وَجَعَلُواْ لَهُۥ مِنۡ عِبَادِهِۦ جُزۡءًاۚ إِنَّ ٱلۡإِنسَٰنَ لَكَفُورٞ مُّبِينٌ ١٥  

Aur unhone iske liye uske baaz bandon ko juz Bana dala, beshak insaan yaqeenan sarihi Na shukra hai.”

Mushrikeen e makka ke bãre mein kaha ja raha hai ki unhone Allah ke bando mein se baaz ko yãni farishton ko  uski betiyãn Kaha, us se badh kar jhooth aur kufr kya ho sakta hai? unhen kaise mãloom hua ke farishte Allah ki betiyãn hain aur Allah ke saath woh bhi ibãdat ke mustahiq Hain? Haqeeqat yeh hai ki isse badhkar kufran e nemat aur kya ho sakta hai ki ek taraf to aitraaf karte Hain ke wohi zaat e  wãhed khãliq arz o sama hai, uska koi saani Naheen Hai aur phir uske liye aulaad sãbit karte hain aur kahte Hain ke uski  woh aulaad Uske mumãsil o mushãba Hai, jaisa ke irshãd farmãya:

 وَيُنذِرَ ٱلَّذِينَ قَالُواْ ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ وَلَدٗا ٤ مَّا لَهُم بِهِۦ مِنۡ عِلۡمٖ وَلَا لِأٓبَآئِهِمۡۚ كَبُرَتۡ كَلِمَةٗ تَخۡرُجُ مِنۡ أَفۡوَٰهِهِمۡۚ إِن يَقُولُونَ إِلَّا كَذِبٗا ٥

Aur un logon ko darãye jinhone Kaha Allah ne koi aulaad bana rakhi hai. na unhen iska koi ilm hai aur na unke baap Dada ko. bolne main badi hai, jo unke munhon se nikalti Hai, wo sarãsar jhooth ke siwa kuch Naheen.” [Al-Kahf # 18: 4 & 5]

Arabic 16 &17

أَمِ ٱتَّخَذَ مِمَّا يَخۡلُقُ بَنَاتٖ وَأَصۡفَىٰكُم بِٱلۡبَنِينَ ١٦ وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُم بِمَا ضَرَبَ لِلرَّحۡمَٰنِ مَثَلٗا ظَلَّ وَجۡهُهُۥ مُسۡوَدّٗا وَهُوَ كَظِيمٌ ١٧  

Ya usne us (maqlookh) mein se jise woh paida karta hai (khud) betiyãn Rakh lein aur tumhen beto ke liye chun liya? Hãlãnki jab un mein se Kisi ko is cheez ki Khush Khabri di jãye jiski usne rehmãn ke liye misaal bayãn ki Hai to uska munh sãra din siyãh rahta Hai aur woh gham se bhara hota Hai.”

 

Allah taa’la ki shaan e beniyãzi ke khilaaf unki jurrat to dekhiye ki unhone uske liye aulaad bhi thehrãyi to aisi jise apne liye Pasand Naheen karte, yãni betiyãn, jinse unke nafrat ka haal yeh hai ke jab unhe khabar di jaati Hai ke unke yahãn ladki paida hui hai to gham o alm se unke chehre siyãh ho jaate hain aur unka dil karb wa azeeyat se bhar jaate hain, jaisa ke irshãd farmãya:

وَيَجۡعَلُونَ لِلَّهِ ٱلۡبَنَٰتِ سُبۡحَٰنَهُۥ وَلَهُم مَّا يَشۡتَهُونَ ٥٧  وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُم بِٱلۡأُنثَىٰ ظَلَّ وَجۡهُهُۥ مُسۡوَدّٗا وَهُوَ كَظِيمٞ ٥٨ يَتَوَٰرَىٰ مِنَ ٱلۡقَوۡمِ مِن سُوٓءِ مَا بُشِّرَ بِهِۦٓۚ أَيُمۡسِكُهُۥ عَلَىٰ هُونٍ أَمۡ يَدُسُّهُۥ فِي ٱلتُّرَابِۗ أَلَا سَآءَ مَا يَحۡكُمُونَ ٥٩

Aur woh Allah ke liye betiyãn tajveez karte hain, woh paak hai aur apne liye woh Jo woh chãahte hain. aur jab un mein se kisi ko ladki ki khushkhabri di jãti uska munh din bhar kaala rehta hai aur woh gham se bhara hota hai. woh logon se chhipta phirta hai, us khushkhabri ki  burãi ki wajah se jo use de gayi hai. Aaya use zillat ke bãwajood rakh le, ya mitti mein daba de. sun lo !  Bura Hai Jo woh faisla karte Hain.” [An-Nahl # 16 : 57 to 59]

 

Saiyyada Asma bint Abubakar (Razi Allahu anha) bayãn Karti hai ki maine Zaid bin Amar bin Nafeel ko dekha ke woh Khãne Kaaba ke saath tek lagãkar khada hai aur kah Raha hai ke ae quresh ki jamaat ! Allah ki Qasam ! mere alãva tum mai se koi bhi deen -e- ibrãheem par naheen Hai. Zaid bin Amar ladkiyon ko zinda dafan hone se bachãya karte the. jab koi aadami apni beti ko qatal karne ka irãda karta to Zaid usse kehte ki tum ise qatal mat karo, main iske tamãm akhrãjat ka zimma leta Hoon. Chunãnche woh ladki ko apni parvarish mein rakh lete, phir jab woh badi ho jaati to uske baap se kehte, agar tum chãho to main tumhãri beti tumhãre supurd kar deta hoon aur agar tumhãri marzi ho to uske sab kaam poore kar dunga. [Bukhãri 3828]

Ayat 18

أَوَ مَن يُنَشَّؤُاْ فِي ٱلۡحِلۡيَةِ وَهُوَ فِي ٱلۡخِصَامِ غَيۡرُ مُبِينٖ ١٨  

“Aur kya (usne use rehmãn ki aulaad qarar Diya Hai) jiski parvarish zevar mein ki jaati hai aur woh jhagde mein baat wãze karne wãli Naheen?” 

yãni ladkiyon ki parvarish aur nash o numa zevar aur zeenat ke sãmaan ke saath hoti hai aur unke zariye se uski shaksiyat mein pãi jaane wãli Kami ko pura Kiya jãta hai aur behas va hujjat ki zarurat pesh Aaye to woh baat saaf naheen kar sakti, balke woh ãjiz o nãtawaan hoti hai, jo is tarah ki ho use Allah tãla ki taraf, Jo Sãhab e Azmat o Shaan Hai, mansoob Kiya ja sakta hai? aur Allah tãla ka juz aur hissa ban sakti hai?

Aayat 19

وَجَعَلُواْ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةَ ٱلَّذِينَ هُمۡ عِبَٰدُ ٱلرَّحۡمَٰنِ إِنَٰثًاۚ أَشَهِدُواْ خَلۡقَهُمۡۚ سَتُكۡتَبُ شَهَٰدَتُهُمۡ وَيُسۡ‍َٔلُونَ ١٩  

Aur unhone farishton ko, woh Jo Rehmãn ke bande hain, aurten bana diya, kya woh unki paidaish ke waqt hãzir the?” unki gawãhi zaroor likhi jãyegi aur woh pochhe jãenge.

Yãni jo farishte Raat din apne khãliq o Mãlik ki tasbeeh o taqdees main lage rehte hain, unhone apni  gayat darja ki jahãlat o nãdani ki wajah se auraten bana Diya. kya jab Allah ne unhen paida kiya tha to us waqt woh maujood the aur unhen ilm ho gya tha ki Allah ne unhen moanis paida Kiya Hai?  Haqeeqat yeh hai ki Allah ki qadr o manzalat ke khilaaf yeh badi hi zãlimãna jurra’at hai, jiske bãre mein qayãmat ke din unse sawaal hoga aur kaha jãega ke apne daawe ki sadãqat par daleel o  burhaan pesh karo, lekin woh ãjiz rahenge aur tab unhen zillat o ruswãi ka saamna karna padega.

Ayat 20 & 21

وَقَالُواْ لَوۡ شَآءَ ٱلرَّحۡمَٰنُ مَا عَبَدۡنَٰهُمۗ مَّا لَهُم بِذَٰلِكَ مِنۡ عِلۡمٍۖ إِنۡ هُمۡ إِلَّا يَخۡرُصُونَ ٢٠ أَمۡ ءَاتَيۡنَٰهُمۡ كِتَٰبٗا مِّن قَبۡلِهِۦ فَهُم بِهِۦ مُسۡتَمۡسِكُونَ ٢١

Aur unhone kaha ki agar rehmãn chãhata to ham unki ibãdat na karte. unhe iske bãre mein kuchh ilm naheen, woh to sirf atkale dauda rahe hain. Ya kya hamne unhen isse pehle koi kitãb Di Hai?  bas woh use mazbooti se thãmne Wãle Hain.”

yãni woh kehte Hain ki agar Allah tãla Chãhata to hamein in buton ko Na poojne deta, Jo farishton ki Surat mein banãye gaye hain aur farishte Allah tãla ki betiyãn Hain. Use is baat ka ilm hai aur usne hamein us per barqaraar rakha hua Hai, agar hamãre is amal se woh Raazi Na hota to hamein apni qudrat ke zariye se is se rok deta. Allah tãla ne unki tardeed ki ke unhein kaise mãloom ho Gaya ki Allah unkeis fel se raazi hai? yeh mahez unki bedaleel o bebuniyãd baatein hain. jab Ke Allah tãla ne jitne ambiya ikraam {(AS)Alehis Salam} maaboos farmãye aur jis qadr kitãben nãzil farmãi, sabki zubãni sirf apni ibãdat Ka hukum Diya hoon aur apne siwa har cheez ki ibãdat se mana farmãya Hai, jaisa ke irshãd farmãya:

وَلَقَدۡ بَعَثۡنَا فِي كُلِّ أُمَّةٖ رَّسُولًا أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱجۡتَنِبُواْ ٱلطَّٰغُوتَۖ فَمِنۡهُم مَّنۡ هَدَى ٱللَّهُ وَمِنۡهُم مَّنۡ حَقَّتۡ عَلَيۡهِ ٱلضَّلَٰلَةُۚ فَسِيرُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَٱنظُرُواْ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلۡمُكَذِّبِينَ ٣٦

Aur bilãshuba yaqeenan hamne har ummat mein ek rasool bheja Hai ke Allah ki ibãdat Karo aur tãqoot se bacho, phir unme se kuchh woh the jinhe Allah ne hidãyat di aur unmein se kuchh woh the Jin par gumrãhi sãbit ho gai. Bas zameen mein chalo phiro, phir dekho jhutlãne wãlon Ka anjaam Kaisa hua.” [An-Nahl # 16: 36]

Agli ãyat main Allah tãla ne farmãya ke kya hamne unko isse pahle koi kitãb di thi ke yeh us per mazbooti se jame hue hain aur uske mutãbiq ghhair Allah ki ibãdat Kar rahe hain? Naheen, unke paas koi kitãb Naheen aur unko khud bhi is baat ka iqrar hai ki woh Kisi kitãb ki buniyaad par aisa Naheen karte, jaisa ke irshãd farmãya:

أَمۡ أَنزَلۡنَا عَلَيۡهِمۡ سُلۡطَٰنٗا فَهُوَ يَتَكَلَّمُ بِمَا كَانُواْ بِهِۦ يُشۡرِكُونَ ٣٥

Ya humne un par koi daleel nãzil ki hai ki woh bolkar woh cheezen batãti hai jinhen woh  uske saath shareek thehrãya karte Hain.” [Ar-Rum # 30: 35]

Aayat 22

بَلۡ قَالُوٓاْ إِنَّا وَجَدۡنَآ ءَابَآءَنَا عَلَىٰٓ أُمَّةٖ وَإِنَّا عَلَىٰٓ ءَاثَٰرِهِم مُّهۡتَدُونَ ٢٢  

Balke unhone Kaha ke beshak hamne Apne baap Dãda ko ek rãste par pãya hai aur ham unhi ke qadmon ke nishãnon par raah pãne wãle hain.”

 

Kuffãr ne apni puja paath ke silsile main ilmi daleel dene se hamesha pehlotahi ikhtiyaar ki aur pehlotahi ikhtiyaar na karte to aakhir karte bhi kya? unke paas ilmi aur kitãbi daleel hoti hi naheen thi ke woh use pesh Karke. yahi wajah hai ki woh saaf saaf baghhair kisi jhijhak ke hat dharmi ke  saath faqriya andaaz mai kehte the ke humne apne aaba o ajdaad ko jis rãste par pãya to ham bas usi rãste par chal rahe hain aur kyunke woh sahi rãste par the, lihãza ham bhi sahi rãste par hai. Unke is qaul ko Allah tãla ne kai jagah bayãn farmãya Hai, jaisa ke irshãd farmãya:

وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّبِعُواْ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُواْ بَلۡ نَتَّبِعُ مَآ أَلۡفَيۡنَا عَلَيۡهِ ءَابَآءَنَآۚ أَوَلَوۡ كَانَ ءَابَآؤُهُمۡ لَا يَعۡقِلُونَ شَيۡ‍ٔٗا وَلَايَهۡتَدُونَ ١٧٠

Aur jab unse Kaha jãta hai uski pairvi karo Jo Allah ne nãzil kiya Hai to kehte hain balke ham to uski pairvi karenge jis par humne apne baap dãda ko pãya hai, kya agarche unke baap dãda na kuchh samajhte ho aur na hidãyat pãte hoon.” [Al-Baqarah # 2: 170] Aur farmãya:

وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّبِعُواْ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُواْ بَلۡ نَتَّبِعُ مَا وَجَدۡنَا عَلَيۡهِ ءَابَآءَنَآۚ أَوَلَوۡ كَانَ ٱلشَّيۡطَٰنُ يَدۡعُوهُمۡ إِلَىٰ عَذَابِ ٱلسَّعِيرِ ٢١

Aur jab unse kaha jãta hai ki uski pairvi karo Jo Allah ne nãzil kiya hai to kehte hain balke ham uski pairvi karenge jis per ham ne apne baap dãda ko pãya, aur kya agarche shaitaan unhen bhadakti aag ke azaab ki taraf bulãa raha ho?” [Luqmãn # 31 : 21]

Aayat 23

وَكَذَٰلِكَ مَآ أَرۡسَلۡنَا مِن قَبۡلِكَ فِي قَرۡيَةٖ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتۡرَفُوهَآ إِنَّا وَجَدۡنَآ ءَابَآءَنَا عَلَىٰٓ أُمَّةٖ وَإِنَّا عَلَىٰٓ ءَاثَٰرِهِم مُّقۡتَدُونَ ٢٣

Aur isi tarah hamne tujhse pehle kisi basti mein koi darãne wãla naheen bheja magar uske khushhaal logon ne kaha ke beshak hamne apne baap dãda ko ek rãste par pãya aur beshak ham unhi ke qadmo ke nishãnon  ke piche chalne wãle hain.”

Is ãyat mein Allah tãla ne farmãya ke quresh ke kãfiron ne yeh koi nayi baat naheen kahi hai, balke har daur ke kuffãr apne kufr o shirk par jame rehne ka yahi sabab bayãn karte Hain, yãni aaba o ajdaad ki taqleed qadeemi gumrãhi hai, jismein har daur ke ahle kufr mubtela rahe hain. isliye ae mere Nabi ! aapko ahl e quresh ke kufr o shirk par malol khãtir naheen hona chãhiye.

Ayat 24 & 25

۞قَٰلَ أَوَلَوۡ جِئۡتُكُم بِأَهۡدَىٰ مِمَّا وَجَدتُّمۡ عَلَيۡهِ ءَابَآءَكُمۡۖ قَالُوٓاْ إِنَّا بِمَآ أُرۡسِلۡتُم بِهِۦ كَٰفِرُونَ ٢٤ فَٱنتَقَمۡنَا مِنۡهُمۡۖ فَٱنظُرۡ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلۡمُكَذِّبِينَ ٢٥

Usne kaha aur kya agar mein tumhãre paas usse ziyãda seedha rãsta le aaon jis par tumne apne baap dãda ko pãya? unhone kaha beshak ham usse jo de kar tum bheje gaye ho, munkir hain. to ham ne unse badla liya, so dekh jhutlãne wãlon ka anjaam kaisa huwa.”

 

Har daur ke Nabi ne apni qaum se kaha agar main tumhãri rehnumãi aisi raah ki taraf karoon jo saa’dat o nek bakhti ki raah hai, to kya phir bhi tum apne aaba o ajdaad ki andhi taqleed mein shaqãwat o badbakhti ki raah par chalte rahoge? to har daur ke kãfiron ne yahi kaha ke haan ! ham tumhãri dãwat ka inkaar karte hain. Yãni tumhe ek zarra barãbar bhi hamãre imaan lãne ki tawaquh naheen rakhni chãhiye. agli ãyat main Allah tãla ne farmãya ki jab kufr o shirk par unka israar is had ko pahunch gaya, to hamne azaab bhej kar unka wajood khatam kar diiya. Allah ke deen aur nabi ko jhutlãne wãlon ka anjaam hamesha aisa hi hota Hai, jaisa ke irshãd farmãya:

ثُمَّ أَرۡسَلۡنَا رُسُلَنَا تَتۡرَاۖ كُلَّ مَا جَآءَ أُمَّةٗ رَّسُولُهَا كَذَّبُوهُۖ فَأَتۡبَعۡنَا بَعۡضَهُم بَعۡضٗا وَجَعَلۡنَٰهُمۡ أَحَادِيثَۚ فَبُعۡدٗا لِّقَوۡمٖ لَّا يُؤۡمِنُونَ ٤٤

Phir hamne apne rasool pe darpe bheje. jab kabhi kisi ummat ke paas uska rasool aaya uhone use jhutla diya, to hamne unke baaz ko baaz ke piche chalta Kiya aur unhen kahãniyãn bana diya. So duri ho un logon ke liye Jo Imaan Naheen lãte.” [Al-Mu’minun # 23:44] aur farmãya:

وَكُلّٗا ضَرَبۡنَا لَهُ ٱلۡأَمۡثَٰلَۖ وَكُلّٗا تَبَّرۡنَا تَتۡبِيرٗا ٣٩

Aur har ek, hamne uske liye misãlein bayãn kein aur har ek ko hamne tabãh kar diya, buri tarah tabãh karna.” [Al-Furqan # 25:39]

Aayat 26 & 27

وَإِذۡ قَالَ إِبۡرَٰهِيمُ لِأَبِيهِ وَقَوۡمِهِۦٓ إِنَّنِي بَرَآءٞ مِّمَّا تَعۡبُدُونَ ٢٦ إِلَّا ٱلَّذِي فَطَرَنِي فَإِنَّهُۥ سَيَهۡدِينِ ٢٧

Aur jab Ibrãheem ne apne baap aur apni qaum se kaha beshak main in cheezon se bilkul bari hoon jin ki tum ibãdat karte ho. Siwãe uske jisne mujhe paida kiya, Bas beshak woh mujhe zarur rãsta dikhãega.”

 

Allah Allah tãla ne apne rasool aur khalil Ibrãheem {(AS)Alehis Salam} Ka hal bayãn kar ke ahl e quresh ko dawat e fikr di ke tum log jis ibrãheem ki mohabbat ka dam bharte ho, unhone to apne baap dãda ki taqleed se elaan-e-braat kar diya tha aur keh diya tha ke main mahez tumhãri taqleed mein tumhãre jhote maabudon ki ibãdat naheen karunga. Kãinaat mein jo aqli dalaeel o braheen maujood hai woh sab is baat ki taraf rehnumãi karte hain ke main usi zaat wãhid ki parastish karun jisne mujhe paida kiya hai aur mujhe yaqeen hai ke mera rab mujhe zãya naheen karega. woh apne sahi deen ki taraf meri rehnumãi karega, apni bandagi ki taufeeq dega, lihãza mein tumhãre maabudon ki ibãdat se sakht bezaar hoon, jaisa ke dusri jagah Allah tãla ne irshaad farmãya:

قَالَ أَفَرَءَيۡتُم مَّا كُنتُمۡ تَعۡبُدُونَ ٧٥  أَنتُمۡ وَءَابَآؤُكُمُ ٱلۡأَقۡدَمُونَ ٧٦ فَإِنَّهُمۡ عَدُوّٞ لِّيٓ إِلَّا رَبَّ ٱلۡعَٰلَمِينَ ٧٧  ٱلَّذِي خَلَقَنِي فَهُوَ يَهۡدِينِ ٧٨ وَٱلَّذِي هُوَ يُطۡعِمُنِي وَيَسۡقِينِ ٧٩  وَإِذَا مَرِضۡتُ فَهُوَ يَشۡفِينِ ٨٠ وَٱلَّذِي يُمِيتُنِي ثُمَّ يُحۡيِينِ ٨١ وَٱلَّذِيٓ أَطۡمَعُ أَن يَغۡفِرَ لِي خَطِيٓ‍َٔتِي يَوۡمَ ٱلدِّينِ ٨٢ 

kaha to kya tumne dekha ke jinko tum poojte rahe. tum aur tumhãre pehle baap dãda. so bilãshuba wo mere dushman hai, siwãe rabbul ãlãmeen ke. woh jisne mujhe paida kiya, phir  wahi mujhe rãsta dikhãta hai. aur wahi Jo mujhe khilãta hai aur mujhe pilãta hai. aur jab mein bimaar hota hoon to wahi mujhe shifa deta hai. aur woh jo mujhe maut dega, phir mujhe zinda karega. aur woh jisse main tamaa’ rakhta hoon ke woh jaza ke din mujhe meri khata bakhsh dega.” [Ash-Shu'ara # 26: 75 to 82] aur farmãya:

قَدۡ كَانَتۡ لَكُمۡ أُسۡوَةٌ حَسَنَةٞ فِيٓ إِبۡرَٰهِيمَ وَٱلَّذِينَ مَعَهُۥٓ إِذۡ قَالُواْ لِقَوۡمِهِمۡ إِنَّا بُرَءَٰٓؤُاْ مِنكُمۡ وَمِمَّا تَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ كَفَرۡنَا بِكُمۡ وَبَدَا بَيۡنَنَا وَبَيۡنَكُمُ ٱلۡعَدَٰوَةُ وَٱلۡبَغۡضَآءُ أَبَدًا حَتَّىٰ تُؤۡمِنُواْ بِٱللَّهِ وَحۡدَهُۥٓ

Yaqeenan tumhãre liye Ibrãheem aur un logon mein jo uske saath the ek achchha namuna tha, jab unhone  apni qaum se kaha ke beshak ham tumse aur un tamãm cheezon se bari hai jinhe tum Allah ke siwa poojte ho, ham tumhen naheen maante aur hamãre darmiyãn aur tumhãre darmiyãn hamesha ke liye dushmani aur bughhaz zãhir ho gaya, yahãn tak ke tum us akele Allah par imaan  lão.” [Al-Mumtahanah # 60:4]

Aayat 28

 وَجَعَلَهَا كَلِمَةَۢ بَاقِيَةٗ فِي عَقِبِهِۦ لَعَلَّهُمۡ يَرۡجِعُونَ ٢٨

Aur usne is (tuaheed ki baat) ko apne pichlo mein baaqi rehne wali baat bana diya, tãke wo rujo  karein.”

Saiyyadna Ibrãheem {(AS)Alehis Salam} ne apni aulaad ko bhi yahi tãleem di thi aur saath yeh tãkeed bhi kar di thi ke agar tum mein koi ikhtilaf wãqae  ho jaaye to usi kalma e tauheed ki taraf rujo karna aur meri is tãleem ko kabhi na bhulna. woh tãleem yahi thi ke Allah ka siwa koi cheez aisi naheen Jo prastish ke qaabil ho.

Ayat 29 & 30

بَلۡ مَتَّعۡتُ هَٰٓؤُلَآءِ وَءَابَآءَهُمۡ حَتَّىٰ جَآءَهُمُ ٱلۡحَقُّ وَرَسُولٞ مُّبِينٞ ٢٩ وَلَمَّا جَآءَهُمُ ٱلۡحَقُّ قَالُواْ هَٰذَا سِحۡرٞ وَإِنَّا بِهِۦ كَٰفِرُونَ ٣٠

Balke main ne unhen aur unke baap dãda ko baratne ka sãman diya, yahãn tak ke unke pass haq aa gaya aur woh rasool Jo khol kar bayãn karne wãla hai. aur jab unke pass haq aaya to unhone kaha ke yeh jãdu hai aur beshak ham isse munkir hain.”

Yãni un kuffãr ki gumrãhi ka yeh sabab naheen ke unke paas bahot arse se koi rasool naheen aaya, balke unki gumrãhi ka asal sabab yeh hai ke main ne unko bhi aur unke aabo ajdaad ko bhi dunyãwi saaz o sãmaan se khob nawãza aur yeh log duniyãwi saaz o sãmaan mein kho gaye, mujh se aur mere ahkãmãt se ghhãfil ho gaye, kalma tauheed ko, jo unhe ibrãheem {(AS)Alehis Salam} se mila tha, bhool gaye aur pori tarah shirk mein mubtela ho gaye, yahãn tak ke unke pass Allah ke rasool wazaye haq le aaye. Tab bhi unhone ne shirk ko na chhorha aur Allah ke Rasool () ko jãdugar kaha. Shirk o zalãlat ki wãdiyon mein bhatakte hue itni door nikal gaye ki raah haq par unka laut kar aana nãmumikin sa ho gaya. Unki isi fitrat ki taraf ishãra karte hue Allah tãla ne irshãd farmãya:

بَلۡ عَجِبۡتَ وَيَسۡخَرُونَ ١٢  وَإِذَا ذُكِّرُواْ لَا يَذۡكُرُونَ ١٣  وَإِذَا رَأَوۡاْ ءَايَةٗ يَسۡتَسۡخِرُونَ ١٤ وَقَالُوٓاْ إِنۡ هَٰذَآ إِلَّا سِحۡرٞ مُّبِينٌ ١٥

balke tune ta’ajjub kiya aur woh mazaaq udãte hain. Aur jab unhen nasihat ki jãye woh qubool naheen karte. Aur jab koi nishãni dekhte hain to khob mazaaq udãte hain. Aur kehte hain yeh saaf jãdu ke siwa kuchh naheen.” [As-Saaffat # 37: 12 to 15]

Ayat 31

وَقَالُواْ لَوۡلَا نُزِّلَ هَٰذَا ٱلۡقُرۡءَانُ عَلَىٰ رَجُلٖ مِّنَ ٱلۡقَرۡيَتَيۡنِ عَظِيمٍ ٣١

“Aur unhone ne kaha yeh Qurãn un do basityon mein se kisi bade aadmi par kyun nãzil na kiya gaya?”

Ahl e quresh fakhr o ghhuroor mein aa kar kehte the ke mansab risãlat makka ke waleed bin mughhera ya taif ke urwa bin masood jaise aadmi ko milna chãhiye, jo duniyãwi maal o jaah wãle hain. Yeh bhi unki kor maghzi aur ghayat darja ki maada parasti thi ke risãlat jaise azeem mansab ka haq daar kisi duniyadaar ko samjhte the, hãlãnki yeh to rohãniyat ka woh azeem tareen rutba hai jiska mustahiq wahi insaan ho sakta hai jo safãi qalab, tahãrat nafs, ikhlaaq o fazail aur qudsi kamãlaat ke aala tareen muqaam par fãyiz ho.

Ayat 32

أَهُمۡ يَقۡسِمُونَ رَحۡمَتَ رَبِّكَۚ نَحۡنُ قَسَمۡنَا بَيۡنَهُم مَّعِيشَتَهُمۡ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَاۚ وَرَفَعۡنَا بَعۡضَهُمۡ فَوۡقَ بَعۡضٖ دَرَجَٰتٖ لِّيَتَّخِذَ بَعۡضُهُم بَعۡضٗا سُخۡرِيّٗاۗ وَرَحۡمَتُ رَبِّكَ خَيۡرٞ مِّمَّا يَجۡمَعُونَ ٣٢

“Kya woh tere rab ki rahmat taqseem karte hain? Ham ne khud unke darmiyãn unki maeyshat duniya ki zindagi mai taqseem ki and unmen se baaz ko baaz par darjo mai buland kiya, tãke unke baaz, baaz ko ta’abe bana le aur tere rab ki rahmat un cheezon se behtar hai jo woh jama karte hain.”

 

Farmãya ke ae rasool ! kya yeh aap ke rab ki rehmat yãni nabuwat ko taqseem karne wãle hain? Nabuwat ko taqseem karna unka kaam naheen, yeh to khãlis Allah tãla ka kaam hai. woh jis ko chãhata hai nabuwat ata farmãta hai, nabi ka intekhaab Allah tãla karta hai aur wahi khoob jãnta hai ke kaun is mansab ka ahel hai aur kaun naheen? Jaisa ke irshãd farmãya:

ٱللَّهُ أَعۡلَمُ حَيۡثُ يَجۡعَلُ رِسَالَتَهُۥۗ

Allah ziyãda jãnne wãla hai jahãn vo apni rasãlat rakhta hai.” [Al-An'am # 6:124] Aur farmãya:

ٱللَّهُ يَصۡطَفِي مِنَ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ رُسُلٗا وَمِنَ ٱلنَّاسِۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعُۢ بَصِيرٞ ٧٥

Allah farishton mein se paighhãm pahunchãne wãle chunta hai aur logon se bhi, beshak Allah sab kuchh sunne wãla, sab kuchh dekhne wãla hai.” [Al Ḥajj # 22:75]

 

Aage farmãya ke kiya woh dekhte naheen ke duniya ki zindagi mein unhen unki rozi ham muhiyya karte hain. Aise ãjiz log Allah par aitraaz karne ki kaise jurrat karte hain aur kehte hain ke  Mohammad (ﷺ) jaise faqeer aadmi ko Allah ne kyun apna rasool bana diya? Allah ki zaat woh hai jisne insãnon ko mukhtalif tabqaat o darjaat mein baant rakha hai, kisi ko maldaar banãya hai to kisi ko faqeer, phir faqeer ko maldaar ke liye muskhar kar diya hai, tãke uski qidmat kare aur jo mazdoori mile usse apni zarurat  poori kare. Na maldaar ki maldãri is baat ki daleel hai ke woh Allah ke nazdeek mehboob hai aur na faqeer ki mohtaji is baat ki daleel hai ke woh Allah ke nazdeek mabghoz hai. Yeh ikhtilaf darjaat Allah ki hikmat o maslihat ke mutãbiq hai, lekin wãfir rizq aur buland martaba is baat ka mutqaazi naheen ke ham jise rizq aur martabe mein fazilat den use nabuwat bhi ata kar den. Nabuwat  ke liye jis ahliyat aur qãbiliyat ki zarurat hai woh Allah hi khoob jãnta hai. ãyat ke aakhir mein Allah tãla ne farmãya ki mansab e nabuwat duniya ke maal o jaah se kaheen ziyãda behtar hai, uska laazmi nateeja yeh hai jinhen yeh nabuwat di gayi hai, yãni nabi kareem (), woh un logon se kaheen behtar hain jo agarche maal o daulat rakhte hain, lekin Allah ki nigãh mein adna aur haqeer tareen log hain.

Ayat 33 to 35

وَلَوۡلَآ أَن يَكُونَ ٱلنَّاسُ أُمَّةٗ وَٰحِدَةٗ لَّجَعَلۡنَا لِمَن يَكۡفُرُ بِٱلرَّحۡمَٰنِ لِبُيُوتِهِمۡ سُقُفٗا مِّن فِضَّةٖ وَمَعَارِجَ عَلَيۡهَا يَظۡهَرُونَ ٣٣ وَلِبُيُوتِهِمۡ أَبۡوَٰبٗا وَسُرُرًا عَلَيۡهَا يَتَّكِ‍ُٔونَ ٣٤ وَزُخۡرُفٗاۚ وَإِن كُلُّ ذَٰلِكَ لَمَّا مَتَٰعُ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَاۚ وَٱلۡأٓخِرَةُ عِندَ رَبِّكَ لِلۡمُتَّقِينَ ٣٥

“Aur agar  yeh na hota ke sab log ek hi ummat ho jãyenge to yaqeenan ham un logo ke liye jo rahmãn ke saath kufr karte hain, unke gharon ki chhaten chaandi ki bana dete aur seediyãn bhi, jin par woh chhadte hain. Aur unke ghãron ke darwãze aur takht bhi, jin par woh takiya lagãte hain. (chaandi ke bana dete) aur sone ke aur yeh sab kuchh duniya ki zindagi ke sãmaan ke siwa kuchh naheen aur aakhirat tere rab ke haan muttaqi logon ke liye hai.”

 

Is ãyat mein Allah tãla ne farmãya ke agar yeh baat na hoti to sãre log hi kãfir ho jãyenge, to duniya to woh haqeer shai hai ke hum tamãm kãfiron ke gharon ki chhaton aur seediyon ko chaandi ka bana dete aur unke gharon ke darwãzo, charpãiyyon aur kursiyon ko bhi chaandi ka bana dete. Ham unhe sone aur jawãhar  ke bane sãmaan haye zeenat se bhi nawãz dete, tãke woh kufr wa tuqyaan mein badhte chale jãte aur shadeed tareen azaab ke mustahiq bante. Isliye ke duniya ki ãrzi nematon ki Allah ki nazdeek koi haisiyat naheen hai. Duniya fãni hai aur iska maal o mata’a bhi fãni aur chand roza hai, jaisa ke irshãd farmãya:

ٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّمَا ٱلۡحَيَوٰةُ ٱلدُّنۡيَا لَعِبٞ وَلَهۡوٞ وَزِينَةٞ وَتَفَاخُرُۢ بَيۡنَكُمۡ وَتَكَاثُرٞ فِي ٱلۡأَمۡوَٰلِ وَٱلۡأَوۡلَٰدِۖ كَمَثَلِ غَيۡثٍ أَعۡجَبَ ٱلۡكُفَّارَ نَبَاتُهُۥ ثُمَّ يَهِيجُ فَتَرَىٰهُ مُصۡفَرّٗا ثُمَّ يَكُونُ حُطَٰمٗاۖ وَفِي ٱلۡأٓخِرَةِ عَذَابٞ شَدِيدٞ وَمَغۡفِرَةٞ مِّنَ ٱللَّهِ وَرِضۡوَٰنٞۚ وَمَا ٱلۡحَيَوٰةُ ٱلدُّنۡيَآ إِلَّا مَتَٰعُ ٱلۡغُرُورِ ٢٠

“Jaan lo ke beshak duniya ki zindagi iske siwa kuchh naheen ke ek khel hai aur dillagi hai aur banão singaar hai aur tumhãre aapas mein ek doosre par badãi jatãna hai aur amwaal aur aulaaad mein ek doosre se badh jãne ki koshish karna hai, us bãrish ki tarah jisse ugne wãli kheti ne kãshtkãro ko khush kar diya, phir woh pak jãti hai, phir tu use dekhta hai ke zard hai, phir woh chura ban jãti hai aur aakhirat mein bahot sakht azaab hai aur Allah ki taraf se badi bakshish aur khushnoodi hai aur duniya ki zindagi dhoke ke sãmaan ke siwa kuchh naheen.” [Al-Hadid # 57:20]

 

Saiyyadna Sahal bin Saeed (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool () ne farmãya: “Agar duniya ki haisiyat Allah ke nazdeek ek machchhar ke par ke barãbar bhi hoti to Allah tãla usmein se kisi kãfir ko ek ghont paani bhi na pilãta.” [Tirmizi 2320]

وَٱلۡأٓخِرَةُ عِندَ رَبِّكَ لِلۡمُتَّقِينَ

Yãni aakhirat aap ke rab ke haan khãs parhezgãron hi ke liye hai, unke alãwa koi aur usmein unka sharik naheen ho sakega, jaisa ke Saiyyadna Abdullah bin Abbãs (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke jab Saiyyadna Umar (Razi Allahu anhu) Allah ke Rasool () ke pass aap ke balã khãne mein gaye aur tab apne apni azwaaj mutãharat se ‘eela’ kar rakha tha. Jab dekha ke aap ek chatãi ke tukde par lete hue hain, jiske nishãn aap ke jism mubãrak par numãyãn hain to woh rone lage aur kehne lage, ae Allah ke rasool ! aap Allah tãla se dua farmãiye ke woh aap ki ummat ko kushãdgi ata karde, fãris aur  rome ke log to khoob aish o ishrat mein hain, duniya unhe khoob mili hui hai, hãlãnke woh Allah tãla ki ibãdat bhi naheen karte. Allah ke Rasool () takiya lagãye hue the, farmãne lage: “ae ibne khatãb ! kya tu abhi shak mein hai? Yeh to woh log hain jinki nekiyon ka badla unhen duniya hi ki zindagi mai jaldi ata kar diya gaya hai.” [Bukhari 2468, Muslim 1479]

 

Saiyyadna Huzefa (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool () ne farmãya: “aur tum sone aur chaandi ke bartanon mein na piyo aur na unki pleyton mein khão, kyunke yeh, un (kãfiro) ke liye duniya mein hain aur hamãre liye aakhirat mai.” [Bukhari 5426, Muslim 2067]

Ayat 36

وَمَن يَعۡشُ عَن ذِكۡرِ ٱلرَّحۡمَٰنِ نُقَيِّضۡ لَهُۥ شَيۡطَٰنٗا فَهُوَ لَهُۥ قَرِينٞ ٣٦

“Aur jo shaks Rahmãn ki nasihat se andha ban jãye ham uske liye ek shaitaan muqarrar kar dete hain, phir woh uske saath rehne wãla hota hai.”

 

Is ãyat karima mai Allah tãla ne Qurãn kareem ki ahmiyat bayãn ki hai jo log Qurãn aur usmein maujood ahkaam se airaaz karte aur use chhorh kar digar gumrãhiyon ko apnãte hain, Allah tãla bataur uqaab unke peechhe shaitaan laga deta hai, phir shaitaan jo kuchh kehta hai woh wahi kaam karte hai, jaisa ke irshãd farmãya:

وَٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمۡوَٰلَهُمۡ رِئَآءَ ٱلنَّاسِ وَلَا يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَلَا بِٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۗ وَمَن يَكُنِ ٱلشَّيۡطَٰنُ لَهُۥ قَرِينٗا فَسَآءَ قَرِينٗا ٣٨

Aur woh log jo apne amwaal logon ke dikhãwe ke liye kharch karte hain aur na Allah par iman lãte hai aur na yaum e aakhirat par, aur woh shakhs ke shaitaan uska saathi ho to woh bura saathi hai.” [An-Nisa # 4:38] Aur farmãya:

إِن يَدۡعُونَ مِن دُونِهِۦٓ إِلَّآ إِنَٰثٗا وَإِن يَدۡعُونَ إِلَّا شَيۡطَٰنٗا مَّرِيدٗا ١١٧ لَّعَنَهُ ٱللَّهُۘ وَقَالَ لَأَتَّخِذَنَّ مِنۡ عِبَادِكَ نَصِيبٗا مَّفۡرُوضٗا ١١٨ وَلَأُضِلَّنَّهُمۡ وَلَأُمَنِّيَنَّهُمۡ وَلَأٓمُرَنَّهُمۡ فَلَيُبَتِّكُنَّ ءَاذَانَ ٱلۡأَنۡعَٰمِ وَلَأٓمُرَنَّهُمۡ فَلَيُغَيِّرُنَّ خَلۡقَ ٱللَّهِۚ وَمَن يَتَّخِذِ ٱلشَّيۡطَٰنَ وَلِيّٗا مِّن دُونِ ٱللَّهِ فَقَدۡ خَسِرَ خُسۡرَانٗا مُّبِينٗا ١١٩ يَعِدُهُمۡ وَيُمَنِّيهِمۡۖ وَمَا يَعِدُهُمُ ٱلشَّيۡطَٰنُ إِلَّا غُرُورًا ١٢٠ أُوْلَٰٓئِكَ مَأۡوَىٰهُمۡ جَهَنَّمُ وَلَا يَجِدُونَ عَنۡهَا مَحِيصٗا ١٢١ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ سَنُدۡخِلُهُمۡ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدٗاۖ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقّٗاۚ وَمَنۡ أَصۡدَقُ مِنَ ٱللَّهِ قِيلٗا ١٢٢

Woh uske siwa naheen pukãrte magar moanison ko aur naheen pukãrte magar sarkash shaitaan ko. Jis par Allah ne lãnat ki aur jisne kaha ke main har surat tere bandon se ek muqarrar hissa zarur lunga. Aur yaqeenan main unhe zaroor gumrãh karunga aur yaqeenan main unhen zaroor aarzooen dilãunga aur yaqeenan main unhen zaroor hukum doonga to yaqeenan woh zaroor chaupãyon ke kaan kãtenge aur yaqeenan main unhen zaroor hukum doonga to yaqeenan woh zaroor Allah ki paida ki hui surat  badlege aur  jo koi shaitan ko Allah ki siwa dost  banãye to yaqeenan usne khasãra uthãya, waze khasãra. Woh unhen waade deta hai aur unhen aarzooen dilãta hai aur shaitan unhen dhoke ke siwa kuchh waada naheen deta. Yeh log hain jinka thikãna jahannum hai aur woh usse bhãgne ki koi jaga naheen pãyenge. Aur woh log jo imaan lãye aur unhone nek ãmaal kiye, anqareeb ham unhe aise bãghhon mein dãkhil karenge jnike niche se nehren behti hain, hamesha unmein rehne wãle hamesha. Allah ka sachcha waada hai aur Allah se ziyãda baat mein kaun sachcha hai.” [An-Nisa 4:117 to 122] Aur farmãya:

ٱسۡتَحۡوَذَ عَلَيۡهِمُ ٱلشَّيۡطَٰنُ فَأَنسَىٰهُمۡ ذِكۡرَ ٱللَّهِۚ أُوْلَٰٓئِكَ حِزۡبُ ٱلشَّيۡطَٰنِۚ أَلَآ إِنَّ حِزۡبَ ٱلشَّيۡطَٰنِ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ ١٩

Shaitaan un par ghhãlib aa gaya, so usne unhe Allah ki yaad bhula di, yeh log shaitaan ka giroh hain. Sun lo! Yaqeenan shaitaan ka giroh hi woh log hain jo khasãra uthãne wãle hain.” [Al-Mujadila # 58:19]

Saiyyadna Abdullah bin Masood (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool () ne farmãya: “tum mein se har ek ke saath Allah tãla ne uska saath jin muqarrar kar rakha hai.” Sahãba ne daryãft kiya, ya Allah ke Rasool ! kiya aap ke saath bhi? Aap ne jawaab diya: “haan ! mere saath bhi, magar Allah tãla ne uske muqabile mein meri madad farmãi hai woh mera (mataye) ho gaya hai. Ab woh mujhe khair ke siwa aur koi hukum naheen deta.” Doosri riwãyat mai yeh alfaaz hain: “tum mein se har kisi ke saath uska ek saathi jino mein se aur ek saath farishton mai se muqarrar kar diya gaya hai.” [Muslim 2814]

Ayat 37

وَإِنَّهُمۡ لَيَصُدُّونَهُمۡ عَنِ ٱلسَّبِيلِ وَيَحۡسَبُونَ أَنَّهُم مُّهۡتَدُونَ ٣٧

“Aur beshak woh zaroor unhen asal raaste se rokte hain aur yeh samjhte hain ke beshak woh seedhi raah par  chalne wãle hain.”

Yãni woh shayãteen Qurãn se airaz karne wãlon ko raah e haq ki itba se rokte rehte hain aur unke dil mein khayaal dãlte rehte hain ke woh haq par hain, hãlãnke yeh sab kuchh shaitãnon ka dhoka aur fareb hota hai. Alghharz is tarah shayãteen insãnon ko sahi raste par naheen aane dete, jaisa ke irshãd farmãya:

وَعَادٗا وَثَمُودَاْ وَقَد تَّبَيَّنَ لَكُم مِّن مَّسَٰكِنِهِمۡۖ وَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيۡطَٰنُ أَعۡمَٰلَهُمۡ فَصَدَّهُمۡ عَنِ ٱلسَّبِيلِ وَكَانُواْ مُسۡتَبۡصِرِينَ ٣٨

Aur aad aur samood ko (ham ne halaak kiya) aur yaqeenan unke rehne ki kuchh jagãhen tumhãre saamne aa chuki hain aur shaitaan ne un ke liye unke kaam mazeen kar diye, bas unhe asal raste se rok diya, hãlãnke woh bahot samajhdaar the.” [Al-Ankabut # 29:38] Aur farmãya:

تَٱللَّهِ لَقَدۡ أَرۡسَلۡنَآ إِلَىٰٓ أُمَمٖ مِّن قَبۡلِكَ فَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيۡطَٰنُ أَعۡمَٰلَهُمۡ فَهُوَ وَلِيُّهُمُ ٱلۡيَوۡمَ وَلَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ ٦٣

Allah ki qasam ! bilãshuba yaqeenan ham ne tujh se pehle bahot si ummaton ki taraf rasool bheje to shaitaan ne unke liye unke ãmal khushnuma bana diye. So wahi aaj unka dost hai aur unhi ke liye dardnaak azaab hai.” [An-Nahl # 16:63]

Ayat 38

حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَنَا قَالَ يَٰلَيۡتَ بَيۡنِي وَبَيۡنَكَ بُعۡدَ ٱلۡمَشۡرِقَيۡنِ فَبِئۡسَ ٱلۡقَرِينُ ٣٨

“Yahãn tak ke jab woh hamãre paas aayega to kahega ae kaash ! mere darmiyãn aur tere darmiyãn do mashriqon ka faasla hota, bas woh bura saathi hai.”

 

Is ãyat  mein Allah tãla ne farmãya ke qayãmat ke din hamãre saamne woh dono hãzir honge, to Qurãn kareem se munh pherne wãla apne shaitaan dost se kahega ke ae kaash ! mere aur tere darmiyãn mashriq o maghhrib ki doori hoti, lekin us waqt bezãri se kuchh hãsil naheen hoga. To ae logo ! hoshiyaar ho jão, beshak shaitaan insaan ka bura saathi hai. Usse duniya mai bezãri ka izhar karoge to tumhe koi fãyda naheen pahunchãega, warna aakhirat mein uske saath saath tumhen bhi dozakh mein daal diya jãega.

Ayat 39

وَلَن يَنفَعَكُمُ ٱلۡيَوۡمَ إِذ ظَّلَمۡتُمۡ أَنَّكُمۡ فِي ٱلۡعَذَابِ مُشۡتَرِكُونَ ٣٩

“Aur aaj yeh baat tumhen hargiz nafa na degi, jab ke tum ne zulm kiya ke beshak tum (sab) azaab mein shareek ho.”

 Yãni us din Allah tãla unse kahega ki duniya mein Allah tãla ke saath ghhairon ko shareek banãne ki wajah se tum par aaj ke din azaab wãjib ho gaya hai, ab koi tamanna tumhen kam naheen degi aur  tum sab yãni tum aur tumhãre shayãteen dost jahannum ke azaab mein barãbar ke shareek hoge.

Arabic 40-42

أَفَأَنتَ تُسۡمِعُ ٱلصُّمَّ أَوۡ تَهۡدِي ٱلۡعُمۡيَ وَمَن كَانَ فِي ضَلَٰلٖ مُّبِينٖ ٤٠ فَإِمَّا نَذۡهَبَنَّ بِكَ فَإِنَّا مِنۡهُم مُّنتَقِمُونَ ٤١ أَوۡ نُرِيَنَّكَ ٱلَّذِي وَعَدۡنَٰهُمۡ فَإِنَّا عَلَيۡهِم مُّقۡتَدِرُونَ ٤٢

“Phir kya tu behron ko sunãega, ya andhon ko raah dikhãega aur unko jo saf gumrãhi mein pade hain. bas agar kabhi ham tujhe le hi jãenge to beshak ham unse inteqaam lene wãle hain. Ya ham wãqai tujhe woh (azaab) dikha den jiska ham unse wãda kiya hai to beshak ham un par poori khudrat rakhne wãle hain.”

 

Nabi kareem (ﷺ) kuffãr makka ki rashd o hidãyat ki badi khawãhish rakhte the, isi liye unke saamne dãwat haq pesh karne ki har mumkin koshish karte aur unki sard mohri aur be aetnayi dekh kar malol khãtir hote, to Allah tãla unhen tasalli deta aur kehta ke aap ka kaam to sirf dãwat islaam pesh kar dena hai. Hidãyat dena to sirf Allah ka kaam hai aur kuffãr e makka to behre hain, unse to qu’at sama’at salab kar li gayi hai, yeh kab Allah ki ãyato aur daleelon ko sun sakenge? Yeh to andhe hain, qu’at basãrat se mehroom hain, Allah ki nishãniyon koi dekh kar bhi unse ibrat hãsil nahin kar sakenge. Seedhi raah se koson door nikal gaye hain, ab raah e raast par naheen aa sakenge, jaisa ke doosri jagah Allah tãla ne irshãd farmãya:

إِنَّكَ لَا تُسۡمِعُ ٱلۡمَوۡتَىٰ وَلَا تُسۡمِعُ ٱلصُّمَّ ٱلدُّعَآءَ إِذَا وَلَّوۡاْ مُدۡبِرِينَ ٨٠ وَمَآ أَنتَ بِهَٰدِي ٱلۡعُمۡيِ عَن ضَلَٰلَتِهِمۡۖ إِن تُسۡمِعُ إِلَّا مَن يُؤۡمِنُ بِ‍َٔايَٰتِنَا فَهُم مُّسۡلِمُونَ ٨١

Beshak tu na murdon ko sunãta hai aur na behron ko apni pukãr sunãta hai, jab woh peeth pher kar palat jãyen. Aur na tu kabhi andhon ko unki gumrãhi se raah par lãne wãla hai, tu naheen sunãyega magar unhi ko jo hamãri ãyat par imaan rakhte hain, phir woh farmãbardãr hain.” [An-Naml # 27: 80 & 81]

 

Agli ãyat mai Allah tãla ne farmãya ke ya to aap un par ghãlib aane se pehle hi duniya se rukhsat ho jãyenge , to haum unke kufr o shirk ka inteqaam azaab e jahannum ke zariye se lenge, ya apne wãde ke mutãbiq apni qudrat ka karishma aap ko duniya hi mein dikha denge, garz yeh ke agar yeh kufr o shirk se baaz na aaye to un par azaab zaroor nãzil hoga, khuwah aap ki zindagi mein nãzil ho, ya aap ki wafaat ke baad nãzil ho, jaisa ke irshãd farmãya:

وَإِمَّا نُرِيَنَّكَ بَعۡضَ ٱلَّذِي نَعِدُهُمۡ أَوۡ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِلَيۡنَا مَرۡجِعُهُمۡ ثُمَّ ٱللَّهُ شَهِيدٌ عَلَىٰ مَا يَفۡعَلُونَ ٤٦         

Aur agar kabhi ham tujhe uska kuchh hissa wãqai dikhla den jiska ham unse wãda karte hain, ya tujhe utha hi len to hamãri hi taraf unko laut kar aana hai, phir Allah us par achchhi tarah gawãh hai jo woh kar rahe hain.” [Yunus # 10:46]

 

Saiyyadna abubardah apne baap se bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “sitãre ãsmaan ke bachãv ka sabab hain, jab sitãre jhad jãyenge to ãsmaan par woh cheez waqe ho jãegi jiska woh wãda diya jãta hai (yãni ãsmaan phat jãyega) aur main apne ashab ke liye zariya e aman hoon, mere jãne ke baad mere sahãba par woh daur aajãega jiska yeh wãda diye jãte hain.” [Muslim 2531]

Ayat 43 & 44

فَٱسۡتَمۡسِكۡ بِٱلَّذِيٓ أُوحِيَ إِلَيۡكَۖ إِنَّكَ عَلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٖ ٤٣ وَإِنَّهُۥ لَذِكۡرٞ لَّكَ وَلِقَوۡمِكَۖ وَسَوۡفَ تُسۡ‍َٔلُونَ ٤٤

“Bas tu usko mazbooti se pakde rakh jo teri taraf wahi kiya gaya hai, yaqeenan tu seedhe raste par hai. Aur bilãshuba woh yaqeenan tere liye aur teri qaum  ke liye ek nasihat hai aur anqareeb tum se pochha jãega.”

Nabi kareem (ﷺ) ko tassalli di ja rahi hai ke jab kuffãr e makka ka haal woh hai jo guzishta ãyat mein bayãn hua hai, yãni dãwat e haq se istafãdah ki har salãhiyat unse salab kar li gayi hai, to aap unke kufr o shirk par ghhamgeen na hoon, balke jo Qurãn aap par nãzil hua hai aur jo deen e haq aap ko diya gaya hai us par gãmzan reh kar Allah ka shukr ada kijiye. Jo Qurãn aap par nãzil hua hai woh aap aur aap ki ummat ke liye nihãyat ba’as e sharf o izzat hai aur woh ibrat o mau’azzit aur shara’e islaam ka khazãna hai. Qayãmat ke din apki ummat se pochha jãyega ke unhone kis had tak ahkaam e qurãni ki pãbandi ki?

فَٱسۡتَمۡسِكۡ بِٱلَّذِيٓ أُوحِيَ إِلَيۡكَۖ إِنَّكَ عَلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٖ

Saiyyadna Muawiya (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “ye amr (yãni khilãfat wa amãrat) quresh mai hi rahega, jo unse (is mãmle mai) jhagdega (aur use unse chheenega), use Allah tãla jahannum mein ondhe munh girãega, us waqt tak jab tak woh deen ko qãyam rakhege.” [Bukhari 7139]

 

Ayat 45

وَسۡ‍َٔلۡ مَنۡ أَرۡسَلۡنَا مِن قَبۡلِكَ مِن رُّسُلِنَآ أَجَعَلۡنَا مِن دُونِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ءَالِهَةٗ يُعۡبَدُونَ ٤٥

“Aur un se pochh jinhen ham ne tujh se pehle apne rasoolon mein bheja, kiya ham ne Rahmãn ke siwa koi ma’abood banãye hain, jinki ibãdat ki jãye?”

 

Tamãm ambiyae ikrãm {(AS)Alehis Salam} ne sirf tauheede bãritãla ki dawãt di, kisi ne bhi buton ki parastish ki taraf logon ko naheen bulãya, Yãni aap ne ahl e quresh ke saamne koi nayi dãwat pesh naheen ki ke woh aap ki takzeeb kar rahe hain aur aap ke dar pe aazar hain. Yeh to wahi dãwat hai jo tamãm ambiya ne apni qaumo ke saamne pesh ki thi. Har nabi ne apni qaum ko yahi nasihat ki ke Allah ki ibãdat karo, uske alãwa koi ilah naheen, jaisa ke irshãd farmãya:

وَمَآ أَرۡسَلۡنَا مِن قَبۡلِكَ مِن رَّسُولٍ إِلَّا نُوحِيٓ إِلَيۡهِ أَنَّهُۥ لَآ إِلَٰهَ إِلَّآ أَنَا۠ فَٱعۡبُدُونِ ٢٥

Aur ham ne tujhse pehle koi rasool naheen bheja magar uski taraf yeh wahi karte the ke beshak haqeeqat yeh hai ke mere siwa koi maabood naheen, so meri ibãdat karo.” [Al-Anbiya # 21: 25] Aur farmãya:

وَلَقَدۡ بَعَثۡنَا فِي كُلِّ أُمَّةٖ رَّسُولًا أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱجۡتَنِبُواْ ٱلطَّٰغُوتَۖ

Aur bilãshuba yaqeenan ham ne har ummat mai ek rasool bheja ke Allah ki ibãdat karo aur taghoot se bacho.” [An-Nahl # 16:36]


Ayat 46 & 47

وَلَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا مُوسَىٰ بِ‍َٔايَٰتِنَآ إِلَىٰ فِرۡعَوۡنَ وَمَلَإِيْهِۦ فَقَالَ إِنِّي رَسُولُ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ ٤٦  فَلَمَّا جَآءَهُم بِ‍َٔايَٰتِنَآ إِذَا هُم مِّنۡهَا يَضۡحَكُونَ ٤٧

“Aur bilãshuba yaqeenan ham ne Moosa ko apni nishãniyon ke saath firaun aur uske sardãron ke paas bheja to usne kaha beshak main tamãm jahãno ke rab ka bheja hua hoon. To jab woh unke paas hamãri nishãniyãn le kar aaya, achãnak woh unke bãre mein hans rahe the.”

 

Allah tãla ne apne bande va Rasool Moosa {(AS)Alehis Salam} ke bãre mein bayãn farmãya hai ke unhen firaun aur uski qaum ke amrae, wazãra, qãyedeen, peerokãron aur qabti  wa israeli riãya ki taraf maaboos farmãya, tãke woh unhe Allah tãl ki ibãdat ki dãwat dein aur Allah tãla ke alãwa har cheez ki pooja se mana karein. Unhein bade bade muajizaat bhi ata kiye, maslan yadbeza aur asa. Uske alãwa toofãn, tiddi dal, juon, mendakon aur khoon ke azaab aur phir faslon, jãnwaron aur phalon ki kami ki surat mein azaab, magar us sab ke bãwajood unhone takkabur kiya aur itba’a o ata’at se inkaar kiya aur in maujizzat ke lãne wãle ki takzeeb ki aur uska mazaaq udãya. Azãbãt ka tazkira karte hue doosre muqaam par Allah tãla ne irshãd farmãya:

وَلَقَدۡ أَخَذۡنَآ ءَالَ فِرۡعَوۡنَ بِٱلسِّنِينَ وَنَقۡصٖ مِّنَ ٱلثَّمَرَٰتِ لَعَلَّهُمۡ يَذَّكَّرُونَ ١٣٠

“Aur bilãshuba yaqeenan ham ne firaun ki aal ko qehat sãliyon aur paidãwaar ki kami ke saath pakda, tãke woh nasihat pakdein.” [Al-A'raf # 7:130] Aur farmãya:

فَأَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِمُ ٱلطُّوفَانَ وَٱلۡجَرَادَ وَٱلۡقُمَّلَ وَٱلضَّفَادِعَ وَٱلدَّمَ ءَايَٰتٖ مُّفَصَّلَٰتٖ فَٱسۡتَكۡبَرُواْ وَكَانُواْ قَوۡمٗا مُّجۡرِمِينَ ١٣٣ وَلَمَّا وَقَعَ عَلَيۡهِمُ ٱلرِّجۡزُ قَالُواْ يَٰمُوسَى ٱدۡعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِندَكَۖ لَئِن كَشَفۡتَ عَنَّا ٱلرِّجۡزَ لَنُؤۡمِنَنَّ لَكَ وَلَنُرۡسِلَنَّ مَعَكَ بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ ١٣٤ فَلَمَّا كَشَفۡنَا عَنۡهُمُ ٱلرِّجۡزَ إِلَىٰٓ أَجَلٍ هُم بَٰلِغُوهُ إِذَا هُمۡ يَنكُثُونَ ١٣٥

To ham ne un par toofãn bheja aur tiddiyan aur juyen aur mendak aur khoon, jo alag alag nishãniyãn theen, Phir bhi unhone takkabur kiya aur woh mujrim log the. Aur jab un par azaab aata to kehte Ae Moosa ! apne rab se is ahed ke wãste dua kar jo usne tere hãn de rakha hai, yaqeenan agar tu ham se yeh azaab door kar de to ham zaroor hi tujh par imaan le aayenge aur tere saath bani israel ko zaroor hi bhej denge. Phir jab hum unse azaab ko waqt tak door kar dete, jaise woh pahunnchne wãle the to achãnak woh ahed tod dete the.” [Al-A'raf # 7:133 to 135]

 

Ayat 48 to 50

وَمَا نُرِيهِم مِّنۡ ءَايَةٍ إِلَّا هِيَ أَكۡبَرُ مِنۡ أُخۡتِهَاۖ وَأَخَذۡنَٰهُم بِٱلۡعَذَابِ لَعَلَّهُمۡ يَرۡجِعُونَ ٤٨ وَقَالُواْ يَٰٓأَيُّهَ ٱلسَّاحِرُ ٱدۡعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِندَكَ إِنَّنَا لَمُهۡتَدُونَ ٤٩ فَلَمَّا كَشَفۡنَا عَنۡهُمُ ٱلۡعَذَابَ إِذَا هُمۡ يَنكُثُونَ ٥٠

“Aur ham unhe koi nishãni naheen dikhlãte the magar woh apne jaisi (pehli nishãni) se badi hoti aur ham ne unhe azaab mein pakda, tãke woh laut aayen. Aur unhone ne kaha ae jãdugar ! hamãre liye apne rab se uske zariye dua kar jo usne tujhse ahaid kar rakha hai, beshak ham zaroor hi seedhi raah par aane wãle hain. Phir jab ham unse azaab hata lete, achãnak woh ahaid tod dete the.”

Is ãyat kareema mai Allah tãla ne is taraf ishãra kiya hai ke firaun aur firauniyon ka istehza kuch is wajah se naheen tha ke woh nishãniyãn hi is qãbil na theen ke un par asar andaaz hoti, balke woh aisa mehaz kubr o inad ki wajah se karte the. Allah tãla ne farmãya ke har nishãni pehli nishãni se badi hoti thi. Ham ne unhen duniyãvi azaab mein bhi mubtela kiya ke shãyad is tarah woh ruju illallahi karen, lekin jab azaab ki sakhti se tilmila uthte to Moosa se kaha, ae jãdugar! tum kehte ho ke tumhãra rab tum par imaan lãne walo se azaab ko taal deta hai, to dua karo ke woh hamse azaab ko door karde. Agar aisa ho gaya to ham tum par imaan le aayenge aur jise tum raah e hidãyat kehte ho use ikhtiyãr kar lenge, chunãnchi hamne unse azaab ko taal diya, to woh fauran bad ahdi kar baithe aur zalãlat o gumrãhi mein aur aage badhte chale gaye.

 

Ayat 51 to 54

وَنَادَىٰ فِرۡعَوۡنُ فِي قَوۡمِهِۦ قَالَ يَٰقَوۡمِ أَلَيۡسَ لِي مُلۡكُ مِصۡرَ وَهَٰذِهِ ٱلۡأَنۡهَٰرُ تَجۡرِي مِن تَحۡتِيٓۚ أَفَلَا تُبۡصِرُونَ ٥١ أَمۡ أَنَا۠ خَيۡرٞ مِّنۡ هَٰذَا ٱلَّذِي هُوَ مَهِينٞ وَلَا يَكَادُ يُبِينُ ٥٢ فَلَوۡلَآ أُلۡقِيَ عَلَيۡهِ أَسۡوِرَةٞ مِّن ذَهَبٍ أَوۡ جَآءَ مَعَهُ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ مُقۡتَرِنِينَ ٥٣ فَٱسۡتَخَفَّ قَوۡمَهُۥ فَأَطَاعُوهُۚ إِنَّهُمۡ كَانُواْ قَوۡمٗا فَٰسِقِينَ ٥٤

“Aur firaun ne apni qaum mein munãdi ki, usne kaha ae meri qaum ! kiya mere paas misr ki bãdshãhi naheen hai? Aur yeh nehren mere tahet naheen chal raheen? To kiya tum naheen dekhte? Balke main us shakhs se behtar hoon, woh jo haqeer hai aur Qareeb naheen ke woh baat wãze kare. Bas us par sone ke kangan kyun naheen daale gaye, ya uske humrãh farishte mil kar kyun naheen aaye? Ghharz usne apni qaum ko halka (bewazan) kar diya to unhone uski ata’at kar li, yaqeenan woh nãfarmãn log the.”

 

Jab Moosa {(AS)Alehis Salam} ki dua se azaab tal gaya to firaun apne dil mein dara ke kaheen log waqai Moosa {(AS)Alehis Salam} par imaan na le aaye, isliye usne paintra badalte hue logon se kaha ke kya mai hukumat misr ka mãlik naheen hoon? Kya dariya e neel ki chaaron shãkhen mere mahel ke paas se naheen guzarti hain. Kya tum log meri in tamãm nematon aur khudraton ka mushãhida naheen karte ho? To phir main behtar hoon ya yeh haqeer insaan?  Yãni Moosa, jo apni khidmat aap karta hai aur apni baat wãze naheen kar pata.

 

Agar  yeh wãqai paighhambar hai aur bada aadmi hai to uske bhejne wãle ne use sone ke kangan kyun naheen pehna diye? Tãke dekhne wãlo ko mãloom hota ke wãqai yeh koi bada insaan hai, ya phir aisa kyun na hua ke uske saath kuch farishte hote jo har dam uske saath rehte aur uski nabuwat ki gawãhi dete?

 

Firaun ne apni qaum ke dil mein yeh baat dãlna chãhi ke rasool ko badi shaan o shaukat  wãla aur farishton mein ghira hua hona chãhiye. Chunãnchi uski shaitãni chaal kaam kar gayi, logon ne uski baat maan li aur Moosa {(AS)Alehis Salam} ko jhutla diya. Allah tãla ne farmãya ke woh log pehle hi se Allah ki bandagi se barghushta the.

 

Ayat 55 & 56

فَلَمَّآ ءَاسَفُونَا ٱنتَقَمۡنَا مِنۡهُمۡ فَأَغۡرَقۡنَٰهُمۡ أَجۡمَعِينَ ٥٥ فَجَعَلۡنَٰهُمۡ سَلَفٗا وَمَثَلٗا لِّلۡأٓخِرِينَ ٥٦

“Phir jab unhone ne hamein ghhussa dilãya to ham ne unse inteqaam liya, Bas ham ne un sab ko ghharq kar diya. Bas ham ne unhe pichhe aane wãlo ke liye peshro aur misaal bana diya.”

 

Allah tãla ne farmãya ke jab firaun aur firauniyon ne hamãre ghaiz o ghhazab ko bhadka diya,  Moosa aur unke mooajizaat ki takzeeb ki, unhen jãdugar kaha aur imaan lãne ka wãda karke bad-ahdi ki, to hamne unse inteqaam le liya aur tamãm ko dariya mein dubo kar unhen aane wãli qaumo ke liya nishaan e ibrat bana diya, jaisa ke irshãd farmãya:

وَأَنجَيۡنَا مُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُۥٓ أَجۡمَعِينَ ٦٥  ثُمَّ أَغۡرَقۡنَا ٱلۡأٓخَرِينَ ٦٦ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ ٦٧  وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ ٦٨

Aur ham ne Moosa ko aur jo uske saath the, sab ko bacha liya. Phir doosron ko dubo diya. Beshak ismein yaqeenan ek nishãni hai aur un ke aksar imaan lãne wãle naheen the. Aur beshak tera rab, yaqeenan wahi sab par ghhãlib, behad rahem wãla hai.” [Ash-Shu'ara # 26: 65 to 68]

 

Saiyyadna Abu Moosa Ashãri (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “beshak Allah azzo wajal zaalim ko mohlat deta hai (uski baag dheeli karta hai, tãke woh khoob nãfarmãni kar le aur azaab ka mustahiq ho jãye), tãham phir jab woh pakadta hai to use chhorhta naheen.” [Bukhari 4686, Muslim 2583]

 

Ayat 57 & 58

۞وَلَمَّا ضُرِبَ ٱبۡنُ مَرۡيَمَ مَثَلًا إِذَا قَوۡمُكَ مِنۡهُ يَصِدُّونَ ٥٧ وَقَالُوٓاْ ءَأَٰلِهَتُنَا خَيۡرٌ أَمۡ هُوَۚ مَا ضَرَبُوهُ لَكَ إِلَّا جَدَلَۢاۚ بَلۡ هُمۡ قَوۡمٌ خَصِمُونَ ٥٨

“Aur jab ibn e mariyam ko bataur misaal bayãn kiya gaya, achãnak teri qaum (ke log) is par shor macha rahe the. Aur unhone kaha kiya hamãre ma’abood behtar hain ya woh? Unhone tere liye yeh (misaal) sirf jhagdne hi ke liye bayãn ki hai, balke woh jhagdãlu log hain.”

 

Jab surah anbiya ke ye ãyat

إِنَّكُمۡ وَمَا تَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ

[Al-Anbiya # 21:98]

“beshak tum aur jinhein tum Allah ke siwa poojte ho, jahannum ka endhan hain” nãzil hui to mushrikeen makka ne yeh aitraaz uthãya ke ibãdat to Moosa {(AS)Alehis Salam} ki bhi ki jãti hai, kya woh bhi jahannum ka endhan banege? Phir is aitraaz ka khoob propaganda shuru kar diya gaya. Unhone yahi sawaal Allah ke Rasool (ﷺ) se kiya to aap khãmosh rahe, kyunki aap khud koi jawaab dene ki nisbat yeh baat ziyãda pasand farmãte the ke mushrikeen ke aise aitraazat ke jo jawaab bazariya wahi nãzil ho wohi unko diye jãye. Aap ki khãmoshi par mushrikeen qehqahe lagãne aur khilkhila kar hansne lage, jiska matlab yeh tha ke hamãri is daleel ne Mohammad (ﷺ) ko chup kara diya hai. Mushrikeen makka ne ghhul yeh machãya tha ke Allah ke siwa saare hi maa’abood jahannum ka endhan banenge to phir Saiyyadna Isa {(AS)Alehis Salam} hamãre ma’aboodon se achchhe kaise ho gaye aur hamãre ma’abood unse kam tar kaise ho gaye? Phir to ham apne hi ma’aboodo ko achchha kahenge.

 

Aakhri ãyat mein Allah tãla farmãya ke unka maqsad talab e haq naheen, balke mehaz mujadila tha aur poori qaum e quresh is marz meinmubtela hai ke woh log bãtil ko ghhãlib karne ke liye jidal ka sahãra lete hain.

مَا ضَرَبُوهُ لَكَ إِلَّا جَدَلَۢاۚ بَلۡ هُمۡ قَوۡمٌ خَصِمُونَ

Yãni unhone yeh misaal mehaz jhagadne ke liye pesh ki hai. Saiyyadna Abu imãma (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “jo bhi qaum hidãyat ke baad gumrãh hui to unhe jhagde mai mubtela kar diya jãta hai.” Phir Allah ke Rasool (ﷺ) ne yeh ãyat tilãwat farmãi:

مَا ضَرَبُوهُ لَكَ إِلَّا جَدَلَۢاۚ بَلۡ هُمۡ قَوۡمٌ خَصِمُونَ

“Unhone ne tere liye yeh (misaal) sirf jhagadne hi ke liye bayãn ki hai, balke woh jhagdãlo log hain.” [Musnad Ahmad 22226, Tirmizi 3253, Ibne Maja 48]

 

Saiyyada Ayesha (Razi Allahu anha) bayan karti hai ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “Allah tãla ko admiyon mein se ziyãda na pasand woh hai jo hat dharm aur sakht jhagdãlo ho.” [Muslim 2668]

 

Saiyyadna Abdullah bin Amar (Razi Allahu anhuma) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool () ne farmãya: “chaar khaslaten aisi hain ke jis shakhs mein bhi hoon woh khãlis munãfiq hai aur jis shakhs mein unmein se koi ek khaslat paayi jaye usmein nafãq ki ek khaslat hogi, yahãn tak ke use chhorh de. (woh yeh hain) jab use amãnatdaar samjha jãye to khayãnat kare, jab baat kare to jhoot kahe, jab ahed kare to use tod dãle aur jab jhagda kare to badzubãni par utar aaye.” [Bukhari 34, Muslim 58]

 

Ayat 59 & 60

إِنۡ هُوَ إِلَّا عَبۡدٌ أَنۡعَمۡنَا عَلَيۡهِ وَجَعَلۡنَٰهُ مَثَلٗا لِّبَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ ٥٩ وَلَوۡ نَشَآءُ لَجَعَلۡنَا مِنكُم مَّلَٰٓئِكَةٗ فِي ٱلۡأَرۡضِ يَخۡلُفُونَ ٦٠

“Naheen hai woh magar ek banda jis par ham ne inaam kiya aur hamne use bani israel ke liye ek misaal bana diya. Aur agar ham chãhen to zaroor tumhãre iwaz farishte bana den, jo zameen mein jãnasheen hoon.”

 

Is ãyat kareema mein Allah tãla ne Isa {(AS)Alehis Salam} ka sahi muqaam bayãn kiya hai ke woh ma’abood naheen, balke Allah ke anginat bandon mein se ek banda hain. Allah ne unko mansab e risãlat ke liye chun liya tha aur unki paidãish ko bani israel ke liye ibrat o moazzat ka sabab banãya tha. Agli ãyat mein farmãya ke Allah tãla har cheez par qãdir hai, agar woh chãhata to insãnon ko halaak kar deta aur unki jagah zameen mein farishton ko bula kar basa deta, jo use apne sajdon se ãbaad karte aur Allah ke saath kisi ko shareek na thaihrãte.

 

Ayat 61 & 62

وَإِنَّهُۥ لَعِلۡمٞ لِّلسَّاعَةِ فَلَا تَمۡتَرُنَّ بِهَا وَٱتَّبِعُونِۚ هَٰذَا صِرَٰطٞ مُّسۡتَقِيمٞ ٦١ وَلَا يَصُدَّنَّكُمُ ٱلشَّيۡطَٰنُۖ إِنَّهُۥ لَكُمۡ عَدُوّٞ مُّبِينٞ ٦٢

“Aur bilãshuba woh yaqeenan qayãmat ki ek nishãni hai to tum usme hargiz shak na karo aur mere pichhe chalo, yeh seedha rãsta hai. Aur kahin shaitan tumhe rok na de, beshak woh tumhãre liye khula dushman hai.”

 

Yãni ae rasool! unse ye bhi keh dijiye ke Ibn e Maryam qayãmat ki nishãni bhi hain, lihãza tum qayãmat ke bãre mein shak na karo. Qayãmat aayegi aur yaqeenan aayegi aur Ibn e Maryam {(AS)Alehis Salam} qayãmat ke qareeb ki alãmat ban kar aayege. Allah ki taraf se mein tumhein jin bãton ka hukum deta hoon un par amal karo, Allah ko ek jãnon, uske saath ghero ko shareek na thaihrão aur usne jo ahkaam farz kiye hain unhein baja lão, yehi seedhi raah hai.

 

Dekho ! shaitaan tumhãre dilon mein islaam, quran aur mere bãre mein shakook o shubãhat paida karke tumhein dhoke mein na daal de. Meri pairwi karna na chorho, kyunki main tumhein isi deen ki dãwat de raha hoon, jo tamaam ambiya e ikrãm {(AS)Alehis Salam} ka deen tha aur jiski wazãhat o bayãn ke liye tamaam kitãben nãzil hueen. Dekho! shaitaan tumhãra khula dushman hai. Isliye usse badh kar kam aqli kiya hogi ke tum apne sareeh dushman ki pairwi karo.

وَإِنَّهُۥ لَعِلۡمٞ لِّلسَّاعَةِ فَلَا تَمۡتَرُنَّ بِهَا

Sahi baat is bãre mein yeh hai ke isse murãd unka qayãmat se pehle nãzil hona hai, jaisa ke Allah tãla ne farmãya:

وَإِن مِّنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ إِلَّا لَيُؤۡمِنَنَّ بِهِۦ قَبۡلَ مَوۡتِهِۦۖ

Aur ahle kitãb mai koi naheen magar uski maut se pehle us par zaroor imaan lãyega.” [An-Nisa # 4:159]

 

Saiyyadna Abu Huraira (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “qayãmat us waqt tak qãyam naheen hogi jab tak tum mein Isa {(AS)Alehis Salam} jo Maryam ke bete hain munsif and hãkim ban kar na nãzil hon. Woh saleeb tod dege, suwar ka qatal kar denge aur jaziya lena band kar denge. Tab maal ki itni kasrat hogi ke koi use qubool naheen karega.” [Bukhari 2476]

 

Saiyyadna Abu Huraira (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “us zaat ki qasam, jiske haath mein meri jaan hai! woh zamãna qareeb hai jab Maryam ke bete tum mein ãdil hukumrãn ban kar nãzil honge. Woh saleeb ko tod phekenge, suwar ko qatal kar denge aur jaziya moquf kar denge aur us waqt maal ki bahut kasrat hogi, yahãn tak ke use koi qubool naheen karega. (yeh hãlat barqaraar rahegi, yahãn tak ke ek waqt aisa aajãyega ke ) us waqt ek sajda duniya o ma feeha se behtar hoga.” [Bukhari 3448, Muslim 155]

 

Saiyyadna Jãbir bin Abdullah (Razi Allahu anhuma) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “meri ummat ka ek giroh haq ke liye hamesha qayãmat tak ladta rahega aur woh ghhãlib rahega, phir Isa ibn Maryam {(AS)Alehis Salam} nãzil honge. Us giroh ka imaam kahega, aaiye! aap namaaz padhãiye! woh kahenge, naheen yaqeenan tum mein se baaz, baaz par hãkim hai. woh buzurgi hai jo Allah tãla ne is ummat ko ata farmãi.” [Muslim 156]

 

Saiyyadna Abdullah bin Amr (Razi Allahu anhuma) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “dajjaal meri ummat mein niklega aur chaalis tak rahega. Main naheen jãnta chaalis din rahega ya chaalis mahine ya chaalis saal. Phir Allah tãla Isa ibn e Maryam {(AS)Alehis Salam} ko bhejega. Unki shakal urwah bin masood saqfi ki si hogi. Woh dajjaal ko dhondenge aur use qatal kar denge, phir saat baras tak log isi tarah rahenge ke do aadmiyon mein koi dushmani naheen hogi. Phir Allah tãla sha’am ki taraf se ek thandi hawa bhejega, to zameen par koi shakhs aisa naheen rahega ke jis ke dil mein ratti barãber bhi imaan ya bhalãi ho, magar yeh ke woh uski jaan nikal legi, Yahãn tak ke agar koi tum mein se pahãd ka kaleja (yãni kis gaar) mein ghus jãye to yeh hawa wahãn bhi pahunch kar uski jaan nikãl legi.” Abdullah (Razi Allahu anhu) ne kaha, main ne Allah ke Rasool (ﷺ) se suna aap ne (uske baad) farmãya: “phir bure log (duniya mein ) reh jãyenge, woh parindo ki tarah kam aqal o bewaqoof honge  aur unke ikhlaaq darindon ki tarah honge. Na woh achchhi baat ko achchha samjhenge aur na buri baat ko bura. Phir shaitaan ek surat bana kar unke paas ayaega aur kahega, tum (meri baat ka) jawaab kyun naheen dete? Woh kahenge, tu hamein hukum deta hai? To shaitaan unhein buton ki puja ka hukum de aur woh usi (but parasti ki) hãlat mein honge, uske bãwajood ke unki rozi kushãda hogi aur woh maze se zindagi guzãrenge, phir soor phonka jãyega. Use jo bhi sunega woh ek taraf se apni gardan jhuka dega aur dosri taraf se utha lega (yãni woh behosh ho kar gir padega) sab se pehle soor (ki ãwaz) ko woh sunega jo apne oonton ke hauz ki marammat kar raha hoga. Woh behosh ho jãega aur doosre log bhi behosh ho jãyenge. phir Allah tãla bãrish barsãyega jo shabnam ki tarah hogi. Usse logon ke badan ugg aayenge, Phir doosra soor phonka jãyega to sab log khade ho hue dekh rahe hoge. Phir pukãra jãyega, ae logo! apne mãlik ke paas aao aur (farishto se kaha jãyega ke) inko khada karo. Tab unse sawaal kiiya jãyega aur phir kaha jãyega ke ek lashkar dozakh ki liye nikãlo. Pocha jãyega, kitne log? Hukum hoga, har hazaar (100) mein se nau sau ninyãnve (999) nikãlo. Aap ne farmãya: “yahi woh din hoga jo bachchon ko budha kar dega aur yahi woh din hai jab pindãli khulegi.” [Muslim 2940]

 

Ayat 63 & 64

وَلَمَّا جَآءَ عِيسَىٰ بِٱلۡبَيِّنَٰتِ قَالَ قَدۡ جِئۡتُكُم بِٱلۡحِكۡمَةِ وَلِأُبَيِّنَ لَكُم بَعۡضَ ٱلَّذِي تَخۡتَلِفُونَ فِيهِۖ فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ ٦٣ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ رَبِّي وَرَبُّكُمۡ فَٱعۡبُدُوهُۚ هَٰذَا صِرَٰطٞ مُّسۡتَقِيمٞ ٦٤

“Aur jab Isa wãze daleelen lekar aaya to usne kaha beshak main tumhãre paas hikmat le kar aaya hoon aur tãke main tumhãre liye baaz woh baaten wãze kar doon jinmein tum ikhtilaaf karte ho, so Allah se daro aur mera kehna mãno. Beshak Allah hi mera rab hai aur tumhãra rab hai, bas uski ibãdat karo, yeh seedha rãsta hai.”

 

Yãni jab Isa {(AS)Alehis Salam} bani isrãel ke paas moajizãt le kar gaye, to unhen khabar di ke main tumhãre paas nabi bana kar aur hikmat ka khazãna de kar bheja gaya hoon, tãke tumhen hikmat ki baaten sikhãun aur Moosa {(AS)Alehis Salam} ki wafaat ke baad deen ke jin ahkaam mein tumhãre darmiyãn ikhtilaaf paida ho gaya hai, unmen haq ko wãze karun. Isiliye bani isrãel ke logo! Allah ki nãfarmãni se daro aur tauheed aur ahkaam bãritãla ke mutãliq jo baaten, main tumhen batlãta hoon unhen qubool karo. Beshak mera aur tumhãra rab Allah hai, uske siwa koi maabood naheen, isliye tum sab sirf uski ibãdat karo, yahi seedhi raah hai.

 

Ayat 65

فَٱخۡتَلَفَ ٱلۡأَحۡزَابُ مِنۢ بَيۡنِهِمۡۖ فَوَيۡلٞ لِّلَّذِينَ ظَلَمُواْ مِنۡ عَذَابِ يَوۡمٍ أَلِيمٍ ٦٥

“Phir kai girohon ne aapas mein ikhtelaaf kiya, so un logon ke liye jinhone zulm kiya ek dardnaak din ke azaab se badi halãkat hai.”

Lekin hua yeh ke Isa {(AS)Alehis Salam} ke duniya se zinda uthãye jãne ke bad nasãra unke bãre mein mukhtalif firkhon mein taqseem ho gaye. Unmen se baaz is baat ka iqraar karte hain ke Isa {(AS)Alehis Salam} Allah tãla ke bande aur uske rasool hain aur haq baat bhi yahi  hai. Baaz yeh dãwa karte hain ke woh Allah ki aulaad hain aur baaz yeh kehte hain ke woh khud Allah hain, jabke Allah ki zaat usse paak, bahot buland o bãla aur irfa o aala hai.

 

Ayat 66

هَلۡ يَنظُرُونَ إِلَّا ٱلسَّاعَةَ أَن تَأۡتِيَهُم بَغۡتَةٗ وَهُمۡ لَا يَشۡعُرُونَ ٦٦

“Woh qayãmat ke siwa kis cheez ka intezaar kar rahe hain ke woh un par achãnak aajãe aur woh sochte bhi na hon.”

 

Yãni qayãmat yaqeenan waqae hone wãli hai, yeh log usse ghhãfil hain aur uski tayyãri naheen kar rahe. Jab woh achãnak aayegi to unhein khabar tak naheen hogi aur us waqt woh had darja nãdim aur pashemaan honge, lekin us waqt nadãmat va pashemãni unke  kuchh kaam naheen aayegi, jaisa ke irshãd farmãya:

فَهَلۡ يَنظُرُونَ إِلَّا ٱلسَّاعَةَ أَن تَأۡتِيَهُم بَغۡتَةٗۖ فَقَدۡ جَآءَ أَشۡرَاطُهَاۚ فَأَنَّىٰ لَهُمۡ إِذَا جَآءَتۡهُمۡ ذِكۡرَىٰهُمۡ ١٨

To woh kis cheez ka intezaar kar rahe hain siwãye qayãmat ke ke woh un par achãnak aajãye, Bas yaqeenan uski nishãniyãn aa chukin, phir unke liye unki nasihat kaise mumkin hogi, jab woh unke paas aajãegi.” [Muhammad # 47:18] Aur faramãya:

بَلۡ تَأۡتِيهِم بَغۡتَةٗ فَتَبۡهَتُهُمۡ فَلَا يَسۡتَطِيعُونَ رَدَّهَا وَلَا هُمۡ يُنظَرُونَ ٤٠

Balke woh un par achãnak aajãyegi to unhe mabhoot kar degi, phir woh  na use hata sakenge aur na unhein mohlat di jãegi.” [Al-Anbiya # 21:40]

 

Ayat 67 to 70

ٱلۡأَخِلَّآءُ يَوۡمَئِذِۢ بَعۡضُهُمۡ لِبَعۡضٍ عَدُوٌّ إِلَّا ٱلۡمُتَّقِينَ ٦٧ يَٰعِبَادِ لَا خَوۡفٌ عَلَيۡكُمُ ٱلۡيَوۡمَ وَلَآ أَنتُمۡ تَحۡزَنُونَ ٦٨ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ بِ‍َٔايَٰتِنَا وَكَانُواْ مُسۡلِمِينَ ٦٩ ٱدۡخُلُواْ ٱلۡجَنَّةَ أَنتُمۡ وَأَزۡوَٰجُكُمۡ تُحۡبَرُونَ ٧٠

“Sab dili dost us din ek doosre ke dushman honge magar muttaqi log . Ae mere bando! aaj na tum par koi khauf hai aur na tum ghhamgeen hoge. Woh log jo hamãri ãyat par imaan lãye aur woh farmãbardar the. Jannat mein dãkhil ho jão tum aur tumhãri biwiyãn, tum khush kiye jãoge.”

 

Duniya mein jinki dosti ki buniyad maishiyat, fitna o fasad, haqq se dushmani aur deegar mãdi aur shehwãni aghraaz o maqãsid par hai, woh qayãmat ke din ek doosre ke dushman ban jãyenge, aapas mein izhaar e  nafrat karne lagenge. Isliye ke jab yeh saari baaten unke  azaab ka sabab banti nazar aayengi to unki dosti dushmani mein badal jãyegi. Lekin jo log yahãn Allah  se darte hain aur aapas mai Allah aur uske rasool ke liye ek doosre se mohabbat karte hain, woh qayãmat ke din bhi ek doosre se mohabbat karenge. Isliye ke duniya mein jin deeni aghraaz o maqãsid par unki mohabbat ki buniyaad thi, us din woh saari baaten unke liye sawaab o nijaat ka sabab ban jãyengi. Isliye unki aapas ki mohabbat aur badh jãyegi aur unki khushi ki koi inteha naheen rahegi, jab Allah tãla unhen pukaar kar kahega ke ae mere bando! aaj ke baad tumhen koi khauf aur koi hazn o malaal lãhaq naheen hoga. Aage Allah tãla ne un khush qismat bando ki kuchh sifaat bayãn karke wazãhat kar di ke yeh woh log honge jo duniya mein Allah tãla ki kitãbon aur uske rasoolon ki tasdeeq karte hain aur deen islaam par amal pairãn hote hain. Allah tãla unse mazeed farmãega ke ae mere bando! tum apni nek biwiyon ke saath jannat mai dãkhil ho jão, jahãn tumhein aisi farhat o shãdmãni milegi ke tumhãre chehre khil uthenge, jaisa ki irshãd farmãya:

تَعۡرِفُ فِي وُجُوهِهِمۡ نَضۡرَةَ ٱلنَّعِيمِ ٢٤

Tu unke chehron mai neymat ki tãzgi pehchãnega.” [Al-Mutaffifin # 83:24]

ٱلۡأَخِلَّآءُ يَوۡمَئِذِۢ بَعۡضُهُمۡ لِبَعۡضٍ عَدُوٌّ إِلَّا ٱلۡمُتَّقِينَ

Yãni har wo dosti aur rafãqat jo ghhair Allah ke liye hogi qayãmat ke din dushmani mein tabdeel ho jãegi, jabke woh dosti jo Allah ke liye hogi woh hamesha hamesha ke liye qãyam o dãyam rahegi. Irshãd farmãya:

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَنفِقُواْ مِمَّا رَزَقۡنَٰكُم مِّن قَبۡلِ أَن يَأۡتِيَ يَوۡمٞ لَّا بَيۡعٞ فِيهِ وَلَا خُلَّةٞ وَلَا شَفَٰعَةٞۗ وَٱلۡكَٰفِرُونَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ ٢٥٤

Ae logo jo imaan lãye ho ! us mein se kharch  karo jo hamne tumhe diya hai, usse pehle ke woh din aaye jis mein na koi khareed o farokht hogi aur na koi dosti aur na koi sifãrish aur kãfir log hi zaalim hain.” [Al-Baqarah # 2:254]

Ayat 71 to 73

يُطَافُ عَلَيۡهِم بِصِحَافٖ مِّن ذَهَبٖ وَأَكۡوَابٖۖ وَفِيهَا مَا تَشۡتَهِيهِ ٱلۡأَنفُسُ وَتَلَذُّ ٱلۡأَعۡيُنُۖ وَأَنتُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ ٧١ وَتِلۡكَ ٱلۡجَنَّةُ ٱلَّتِيٓ أُورِثۡتُمُوهَا بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ٧٢  لَكُمۡ فِيهَا فَٰكِهَةٞ كَثِيرَةٞ مِّنۡهَا تَأۡكُلُونَ ٧٣

“Unke gird sone ke thaal aur piyãle le kar phirae jãyega aur usmein woh har cheez hogi jiski dil khawãhish karenge aur aankhen lazzat  pãyengi aur tum usmein hamesha rehne wãle ho. Aur yahi wo jannat hai jiske tum wãris banãye gaye ho, uski wajah se jo tum amal karte the. Tumhãre liye usmein bahot se mewe hain, jin se tum khãte ho.”

 

Ahle jannat ke saamne sone ki rakãbiyo aur plaiton mein lazeez tareen khãne pesh kiye jãenge aur sone hi ke piyãle honge jo inwãh o iqsaam ki behtreen sharãbo se labãlab honge. Jannat mai har woh cheez hogi jiski koi nafs khawãhish karega aur jisse aankhon ko thandak aur dil ko suroor milega. Jannatiyon se kaha jãyega ke ab tum hamesha yahi rahoge, na tumhe maut lãhaq hogi aur na yeh namaten khatam hogi. Yeh jannat tumhen un bhalãyion ke badle mein mili hai jo tum duniya mein karte rahe the. Jannat mein tumhen beshumaar taaza phal aur khushk phal mila karenge, jo na kabhi khatam honge aur na tumhen unke khane se kabhi roka jãega, jaisa ke Allah tãla ne irshãd farmãya:

أَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ فَلَهُمۡ جَنَّٰتُ ٱلۡمَأۡوَىٰ نُزُلَۢا بِمَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ١٩

Lekin woh log jo imaan lãyenge aur unhone nek amal kiye to unke liye rehne ke bãghhãt hain, mehmãni uske jo woh kiya karte the.” [As-Sajdah # 32:19]

Saiyyadna Huzaifa (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “sone aur chaandi ke bartan mein na piyo aur na sone aur chaandi ke bartanon mein khão, kyunke sone aur chaandi ke bartan duniya mein kãfiron ke liye hain aur aakhirat mein hamãre liye hain.” [Bukhari 5426]

 

Saiyyadna Abu Saeed Khudri (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “jab jannati jannat mein aur dozakhi dozakh mein dãkhil ho jãenge to maut ko (is hãlat mein) lãya  jãega goya woh ek chitkabra mendha hai, use jannat aur dozakh ke darmiyãn rakh diya jãega. Phir ek munãdi nida karega, ae ahl e jannat! ab maut naheen aayegi,  ae ahle dozakh! ab maut naheen aayegi, har shakhs hamesha isi hãlat mein rahega jis hãlat mai woh (ab) hai. Yeh sun kar jannatiyon ki khushi aur badh jãyegi aur dozakhiyon ke ghham mein izãfa ho jãyega.” [Muslim 2849, Bukhari 6548]

 

Saiyyadna Abu Huraira (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool () ne farmãya: “jo shakhs jannat  meini dãkhil hoga woh hamesha aish mai rahega (ranj o ghaam se use kabhi wãsta naheen padega) uske kapde kabhi purãne naheen honge aur uski jawãni kabhi zãyil naheen hogi.” [Muslim 2836]

 

Saiyyadna Abu Saeed Khudri aur Saiyyadna Abu Huraira (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne farmãya: “ek manãdi nida karega (ae ahle jannat!) beshak tum ab tandurust rahoge kabhi bimaar naheen padoge, tum zinda rahoge tumhe kabhi maut naheen aayegi, tum jawaan rahoge tumhe kabhi budhãpa naheen aayega, tum aish mai zindagi guzãroge tumhe hazn o  malaal kabhi naheen hoga.” Yãhi matlab hai Allah tãla ke us farmãn ka:

وَنُودُوٓاْ أَن تِلۡكُمُ ٱلۡجَنَّةُ أُورِثۡتُمُوهَا بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ٤٣

Aur unhen ãwaaz di jãegi ke yahi woh jannat hai jiske wãris tum iski wajah se banãye gaye ho jo tum kiya karte the.” [Al-A'raf # 7:43]

 

Ayat 74 to 76

إِنَّ ٱلۡمُجۡرِمِينَ فِي عَذَابِ جَهَنَّمَ خَٰلِدُونَ ٧٤ لَا يُفَتَّرُ عَنۡهُمۡ وَهُمۡ فِيهِ مُبۡلِسُونَ ٧٥ وَمَا ظَلَمۡنَٰهُمۡ وَلَٰكِن كَانُواْ هُمُ ٱلظَّٰلِمِينَ ٧٦  

“Beshak mujrim log jahannum ke azaab mein hamesha rehne wãle hain. Woh unse halka naheen kiya jãega aur woh usi mai nãumeed honge. Aur hamne un par zulm naheen kiya aur lekin woh khud hi zãlim the.”

 

Sa’adat mand logo ke zikr ke baad Allah tãla ne bad bakhtiyon ka zikr shuru farma diya hai. Allah tãla ne farmãya ke jo mujrim duniya mai kufr o shirk aur deegar ma’asi ka irtakaab karte hain aur isi haal hai unki maut aajãti hai, to woh hamesha ke liye jahannum mein daal diye jãenge. Unka azaab kabhi halka naheen kiya jãyega aur unke dilon par hamesha ke liye yaas o nãumeedi ka gehra sãya pad jãega, jaisa ke irshãd farmãya:

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَمَاتُواْ وَهُمۡ كُفَّارٌ أُوْلَٰٓئِكَ عَلَيۡهِمۡ لَعۡنَةُ ٱللَّهِ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ وَٱلنَّاسِ أَجۡمَعِينَ ١٦١  خَٰلِدِينَ فِيهَا لَا يُخَفَّفُ عَنۡهُمُ ٱلۡعَذَابُ وَلَا هُمۡ يُنظَرُونَ ١٦٢

Beshak woh log jinhone kufr kiya aur is haal mein mar gaye ke woh kãfir the, aise log hain jin par Allah ki aur farishto aur logon ki, sab ki lãnat hai.  Hamesha us mein rehne wãle hain, na unse azaab halka kiya jãega aur na unhen mohlat di jãegi.” [Al-Baqarah # 2: 161 to 162] Aur farmãya:

وَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَهُمۡ نَارُ جَهَنَّمَ لَا يُقۡضَىٰ عَلَيۡهِمۡ فَيَمُوتُواْ وَلَا يُخَفَّفُ عَنۡهُم مِّنۡ عَذَابِهَاۚ كَذَٰلِكَ نَجۡزِي كُلَّ كَفُورٖ ٣٦

Aur woh log jinhone kufr kiya unke liye jahannum ki aag hai, na unka kaam tamaam kiya jãega ke woh mar jãye aur na unse uska kuchh azaab hi halka kiya jãega. Ham aise hi  har nãshukre ko badla diya karte hain.” [Fatir # 35:36]

Aakhri ãyat mein farmãya ke Allah ne unhein dozakh mai bhej kar un par zulm naheen kiya, balke woh duniya ki zindagi meini Allah tãla ki nãfarmãni karke apni jãnon par khud zulm karte rahe. Na woh Allah tãla ki nãfarmãni karte aur  na dozakh mein jãte. Unhone dozakh mein jãne ka sabab khud paida kiya, lihãza dozakh ke azaab ke woh khud zimmedaar hai, jaisa ke Allah tãla ne irshãd farmãya:

إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَظۡلِمُ ٱلنَّاسَ شَيۡ‍ٔٗا وَلَٰكِنَّ ٱلنَّاسَ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ ٤٤

Beshak Allah logon par kuch bhi zulm naheen karta aur lekin log apne aap par zulm karte hain.” [Yunus # 10:44]

Saiyyadna Abuzar (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah Ke Rasool () ne farmãya: “Allah tãla farmãta hai, ae mere bando! maine apne aap par zulm haraam kiya hai aur maine use tum par bhi haraam kar diya hai, so tum aapas mai ek doosre pe zulm na karo.” [Muslim 2577]

 

Ayat 77 & 78

وَنَادَوۡاْ يَٰمَٰلِكُ لِيَقۡضِ عَلَيۡنَا رَبُّكَۖ قَالَ إِنَّكُم مَّٰكِثُونَ ٧٧ لَقَدۡ جِئۡنَٰكُم بِٱلۡحَقِّ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَكُمۡ لِلۡحَقِّ كَٰرِهُونَ ٧٨

“Aur woh pukãrenge ae mãlik! tera rab hamãra kaam tamaam hi kar de. Woh kahege beshak tum (yaheen) theharne wãle ho. Bilãshuba ham to tumhãre paas haq le kar aaye hain aur lekin tum mein se aksar haq ko nãpasand karne wãle hain.”

 

Ahle Jahannum khazãn e jahannum ko pukãrenge aur kahenge, ae  mãlik ! tum hamãre liye apne rab se sawaal karo ke woh hamen maar dãle, tãke azaab se nijaat mil jãye. To ek taweel muddat ke bad mãlik unhen jawaab dega, mere rab ka kehna hai ke tum log ab isi mein rahoge, jaisa ke irshãd farmãya:

وَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَهُمۡ نَارُ جَهَنَّمَ لَا يُقۡضَىٰ عَلَيۡهِمۡ فَيَمُوتُواْ وَلَا يُخَفَّفُ عَنۡهُم مِّنۡ عَذَابِهَاۚ كَذَٰلِكَ نَجۡزِي كُلَّ كَفُورٖ ٣٦ وَهُمۡ يَصۡطَرِخُونَ فِيهَا رَبَّنَآ أَخۡرِجۡنَا نَعۡمَلۡ صَٰلِحًا غَيۡرَ ٱلَّذِي كُنَّا نَعۡمَلُۚ أَوَ لَمۡ نُعَمِّرۡكُم مَّا يَتَذَكَّرُ فِيهِ مَن تَذَكَّرَ وَجَآءَكُمُ ٱلنَّذِيرُۖ فَذُوقُواْ فَمَا لِلظَّٰلِمِينَ مِن نَّصِيرٍ ٣٧

Aur  woh log jinhone kufr kiya unke liye jahannum ki aag hai, na unka kaam tamaam kiya jãega ke woh mar jãyen aur na hi unse uska kuchh azaab hi halka kiya jãega. Ham aise hi nãshukre ko badla diya karte hain. Aur woh usmein chillãyenge, ae hamãre rab! hamein nikãl le, ham nek amal karenge, uske khilaf jo ham kiya karte the. Aur kiya hamne tumhe itni umar naheen di ke usmein jo nasihat hãsil karna chãhata, hãsil kar leta aur tumhãre paas khaas darãne wãle bhi aaya. Bas chakho ke zãlimo ka koi madadgaar naheen.” [Fatir # 35: 36 to 37]

 

Aage farmãya ke ham ne tumhãre paas kitãben bhejen aur ambiya mabo’os kiye, jinhone tumhãre saamne haq ki dãwat pesh ki to tumne izhaar e nafrat kiya aur imaan naheen lãye. Ab kãfir Allah ke sãmne ko hujjat pesh naheen kar sakte, kyunke rasoolon ka aana hi Allah ki taraf se tamaam hujjat hota hai, jaisa ke irshãd farmãya:

رُّسُلٗا مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى ٱللَّهِ حُجَّةُۢ بَعۡدَ ٱلرُّسُلِۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمٗا ١٦٥

Aise rasool jo khushkhabri dene wãle aur darãne wãle the, tãke logon ke paas rasoolon ke baad Allah ke muqãble mein koi hujjat na reh jãye aur Allah hamesha se sab par ghhãlib, kamaal hikmat wãla hai.” [An-Nisa # 4:165]

وَنَادَوۡاْ يَٰمَٰلِكُ لِيَقۡضِ عَلَيۡنَا رَبُّكَۖ

Saiyyadna Samra bin Jindab (Razi Allahu anhu) se riwãyat hai ke ek din subah ki namãz ke baad Allah ke Rasool (ﷺ) ne ek lamba khawãb bayãn kiya, usme aap () ne yeh bhi bayãn kiya: “phir ham aage badhe aur ek nihãyat badsurat aadmi ke paas pahunche. Itna ke jitne tumne dekhe hoge unmein sab se ziyãda badsurat, uske paas aag jal rahi thi aur use jala raha tha aur uske chaaron taraf daud raha tha, maine un (Jibrãel aur Mikãeel) se pocha ke yeh kaun hai? To unhone kaha, woh shakhs jo jahannum ki aag bhadka raha hai aur uske chaaron taraf chal phir raha hai woh jahannum ka darogha mãlik hai.” [Bukhari 7047]

 

Saiyyadna ALi (Razi Allahu anhu) bayãn karte hain ke Allah ke Rasool (ﷺ) ne membar par is ãyat kareema ki talãwat farmãi:

وَنَادَوۡاْ يَٰمَٰلِكُ لِيَقۡضِ عَلَيۡنَا رَبُّكَۖ قَالَ إِنَّكُم مَّٰكِثُونَ

“Aur woh pukãrenge ae mãlik! tera rab hamãra kaam tamaam hi karde. Woh kahega beshak tum (yaheen) theherne wãle ho.” [Bukhari 4819]

 

Ayat 79

أَمۡ أَبۡرَمُوٓاْ أَمۡرٗا فَإِنَّا مُبۡرِمُونَ ٧٩

“Ya unhone kisi  kaam ki pukhta tadbeer kar li hai? To beshak ham bhi pukhta tadbeer karne wãle hain.”

Kãfir islaam ko aur Allah ke Rasool (ﷺ) ko nuqsaan pahunchãne ke liye mukhtalif qism ki sãzishen kiya karte the. Allah tãla ne farmãya ke unhone ne kisi aisi hi sãzish ka pakka irãda kar liya hai to unhen khabardaar ho jãna chãhiye ke hamne bhi unki sãzish ko nãkam banãne ke liye pakka irãda kar liya hai, unki tadbeerein sab ulat jãengi aur yeh khud hi apni tadbeeron ka shikaar ho jãenge, jaisa ke irshãd farmãya:

 أَمۡ يُرِيدُونَ كَيۡدٗاۖ فَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ هُمُ ٱلۡمَكِيدُونَ ٤٢

Ya woh  koi chaal chalna chãhate hain? To jin logon ne kufr kiya wahi chaal mein aane wãle hain.” [At-Tur # 52:42]

Allah tãla ki tadbeer ke muqable mai kãfiron ki tadbeer naheen chalti, jaisa ke irshãd farmãya:

وَمَكَرُواْ مَكۡرٗا وَمَكَرۡنَا مَكۡرٗا وَهُمۡ لَا يَشۡعُرُونَ ٥٠ فَٱنظُرۡ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ مَكۡرِهِمۡ أَنَّا دَمَّرۡنَٰهُمۡ وَقَوۡمَهُمۡ أَجۡمَعِينَ ٥١ فَتِلۡكَ بُيُوتُهُمۡ خَاوِيَةَۢ بِمَا ظَلَمُوٓاْۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗ لِّقَوۡمٖ يَعۡلَمُونَ ٥٢

Aur unhone ek chaal chali aur hamne bhi ek chaal chali aur woh sonchte tak na the. Bas dekh unki chaal ka anjaam kaisa hua ke beshak hamne unhein aur unki qaum, sab ko halaak kar dãla. To yeh hain unke ghar gire hue, uske bães jo unhone zulm kiya. Beshak usmein un logon ke liye yaqeenan ek nishãni hai jo jãnte hain.” [An-Naml # 27: 50 to 52]

 

Ayat 80

أَمۡ يَحۡسَبُونَ أَنَّا لَا نَسۡمَعُ سِرَّهُمۡ وَنَجۡوَىٰهُمۚ بَلَىٰ وَرُسُلُنَا لَدَيۡهِمۡ يَكۡتُبُونَ ٨٠

“Ya woh gumaan karte hain ke beshak ham unka raaz aur unki sargoshi naheen sunte, kyun naheen aur hamãre bheje hue unke paas likhte rehte hain.”

 

Allah tãla farma rahe hain ke kuffãr makka samajhte hain ke ham unke dilon ke bhedon aur poshida jagãhon mein islaam aur Allah ke rasool () ke khilaaf unki sargoshiyon ko naheen sunte. Yeh unki kham khayãli aur nadãni hai, ham unke dilon ke bhedon ko jãnte hain aur unki sargoshiyon ko sunte hain. Hamãre farishte unke tamaam aqwaal ã afa’al likh lete hain, jaisa ke irshãd farmãya:

إِذۡ يَتَلَقَّى ٱلۡمُتَلَقِّيَانِ عَنِ ٱلۡيَمِينِ وَعَنِ ٱلشِّمَالِ قَعِيدٞ ١٧  مَّا يَلۡفِظُ مِن قَوۡلٍ إِلَّا لَدَيۡهِ رَقِيبٌ عَتِيدٞ ١٨

Jab (uske har qaul o fail ko) do lene wãle lãte hain, jo dãyen taraf aur bãyen taraf baithe hain. Woh koi bhi baat naheen bolta magar uske paas ek tayyaar nigraan hota hai.” [Qaf # 50: 17 to 18]

 

Ayat 81 & 82

قُلۡ إِن كَانَ لِلرَّحۡمَٰنِ وَلَدٞ فَأَنَا۠ أَوَّلُ ٱلۡعَٰبِدِينَ ٨١ سُبۡحَٰنَ رَبِّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ رَبِّ ٱلۡعَرۡشِ عَمَّا يَصِفُونَ ٨٢

“Keh de agar rahmãn ki koi aulaad ho to main sabse pehle ibãdat karne wãla hoon. Paak hai asmãnon aur zameen ka rab, jo arsh ka rab hai, usse jo woh bayãn karte hain.”

Kuffãr makka ne farishton ko Allah tãla ki betiyãn qaraar diya tha, to Allah tãla ne kuffãr ke is aqeede ki tardeed karte hue Nabi kareem (ﷺ) ki zubãni kaha ke agar bafraz mahaal Allah ki koi aulaad hoti, to sab se pehle main uski ibãdat karta, lekin chunke uski aulaad naheen hai, isliye main uske siwa kisi ki ibãdat naheen karta. Agli ãyat mein Allah tãla ne mazkor bãla mushrikãna khayãl se apni paaki bayãn ki hai, yãni uski zaat us aib se paak hai ke koi uski aulaad hai, woh to asmãnon aur zameen ka aur arsh bãren ka rab aur mãlik hai. Har cheez uski ke qabza e qudrat mein hai.

 

Ayat 83

فَذَرۡهُمۡ يَخُوضُواْ وَيَلۡعَبُواْ حَتَّىٰ يُلَٰقُواْ يَوۡمَهُمُ ٱلَّذِي يُوعَدُونَ ٨٣

“Bas unhen chhorh de fizool behas karte rahen aur khelte rahen, yahãn tak  ke apne us din ko ja milein jiska unse wãda kiya jãta hai.”

 

Nabi kareem () se kaha gaya hai ke agar mushrikan makka aap ki dãwat e tauheed ko qubool naheen karte aur apne shirk par israar karte hain, to aap unhen unki bãtil parasti mai bhatka chhorh dijiye aur laho o laab mai mashghhool rehne dijiye, yahãn tak ki qayãmat ka din aajãye, jab Allah unhe unki iftra pardazi ki wajah se jahannum mein daal dega, jaisa ke irshãd farmãya:

فَوَيۡلٞ يَوۡمَئِذٖ لِّلۡمُكَذِّبِينَ ١١  ٱلَّذِينَ هُمۡ فِي خَوۡضٖ يَلۡعَبُونَ ١٢ يَوۡمَ يُدَعُّونَ إِلَىٰ نَارِ جَهَنَّمَ دَعًّا ١٣  هَٰذِهِ ٱلنَّارُ ٱلَّتِي كُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ١٤

To us din jhutlãne wãlo ke liye badi halãkat hai. Woh jo fizool behas mein khel rahe hain. Jis din unhe jahannum ki aag ki taraf dhakela jãega sakht dhakela jãna. Yahi hai woh aag jise tum jhutlãte the.” [At-Tur # 52: 11 to 14]

 

Ayat 84 & 85

وَهُوَ ٱلَّذِي فِي ٱلسَّمَآءِ إِلَٰهٞ وَفِي ٱلۡأَرۡضِ إِلَٰهٞۚ وَهُوَ ٱلۡحَكِيمُ ٱلۡعَلِيمُ ٨٤ وَتَبَارَكَ ٱلَّذِي لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَيۡنَهُمَا وَعِندَهُۥ عِلۡمُ ٱلسَّاعَةِ وَإِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ ٨٥

“Aur wahi hai jo asmãnon mein ma’abood hai aur zameen mein bhi ma’abood hai aur wahi kamaal hikmat wãla, sab kuchh jãnne wãla hai. Aur bahot barkat wãla hai woh jiske paas asmãnon ki aur zameen ki bãdshãhi hai aur uski bhi jo un dono ke darmiyãn hai aur usi ke paas qayãmat ka ilm hai aur usi ki taraf tum lautãye jãoge.”

 

Allah ki zaat e barhaq hi arz o sama mai ibãdat kiye jãne ke lãyaq hai, har ta’azeem o mohabbat ka wahi tanha mustahiq hai aur har bande ki zillat o ãjizi sirf usi ke liye jãyez hai. Uska har fail mubni bar hikmat aur uska ilm makhlooq ke tamaam ahwaal ko ghere hue hai. Uski zaat biwi aur aulaad ki mohtaaj naheen hai, woh is aib se bartar o bãla hai. Asmãnon  aur zameen aur unke darmiyãn ki har shae ka wahi tanha mãlik hai, uske siwa kisi ko khabar naheen ke qayãmat kab waqae hogi? Sab ko usi ke paas laut kar jãna hai, jahãn woh har ek ko uske kiye ka badla dega.

 

Ayat 86

وَلَا يَمۡلِكُ ٱلَّذِينَ يَدۡعُونَ مِن دُونِهِ ٱلشَّفَٰعَةَ إِلَّا مَن شَهِدَ بِٱلۡحَقِّ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ ٨٦

“Aur woh log jinhein yeh uske siwa pukãrte hain, woh sifãrish ka ikhtiyaar naheen rakhte magar jisne haq ke saath shahãdat di aur woh jãnte hain.”

 

Is ãyat kareema mein mushrikeen arab ke us mushrikãna aqeeda ki tardeed hai ke farishte aur unke deegar jhute ma’abood qayãmat ke din unke liye sifãrishi banege. Farmãya ke shifa’at to Allah ki ijãzat se sirf uske woh bande karenge, jo Allah ki wahdãniyat ke siddaq dil se qãyal honge aur kisi ko uska shareek naheen thaehrãenge.

 

Ayat 87

وَلَئِن سَأَلۡتَهُم مَّنۡ خَلَقَهُمۡ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُۖ فَأَنَّىٰ يُؤۡفَكُونَ ٨٧

“Aur yaqeenan agar  tu unse pochhe ke unhe kis ne paida kiya to bilãshuba zaroor kahenge ke Allah ne, phir kahãn behkãye jãte hain.”

 

Allah tãla ne Nabi kareem (ﷺ) se kaha hai ke agar aap mushrikeen se pochhen ke unhe kisne paida kiya hai? To woh jawaab denge ke hamein Allah ne paida kiya hai. Yãni yeh baat itni zãhir hai ke woh kisi haal mein bhi iska inkaar naheen kar pãte, to phir unki yeh kitni badi nãdãni hai ke ibãdat uske siwa ghhairon ki karte hain. Isiliye ãyat ke aakhir mein kaha gaya hai ke yeh jãnte hue ke unka khãliq  Allah hai, uske siwa ghhairon ki ibãdat kaise karte hain?

 

Ayat 88 & 89

وَقِيلِهِۦ يَٰرَبِّ إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ قَوۡمٞ لَّا يُؤۡمِنُونَ ٨٨  فَٱصۡفَحۡ عَنۡهُمۡ وَقُلۡ سَلَٰمٞۚ فَسَوۡفَ يَعۡلَمُونَ ٨٩

“Qasam hai rasool ke “ya rab” kehne ki! ke beshak yeh aise log hain jo imaan naheen lãyenge. Bas unse darguzar kar aur keh salaam hai, Bas anqareeb woh jaan lenge.”

 

Allah tãa ne farmãya ke use apne Rasool () ki us dard bhãri baat ka ilm hai ke ae mere rab! yeh mushrikeen makka imaan naheen lãyege, jaisa ki doosri jaga irshãd farmãya:

وَقَالَ ٱلرَّسُولُ يَٰرَبِّ إِنَّ قَوۡمِي ٱتَّخَذُواْ هَٰذَا ٱلۡقُرۡءَانَ مَهۡجُورٗا ٣٠

Aur rasool kahega ae mere rab ! beshak meri qaum ne is qurãn  ko chhorha hua bana rakha tha.” [Al-Furqan # 25:30]

 

Agli ãyat mein irshãd farmãya ke unka inad aur unke dil ki sakhti had se badhi hui hai, bas ae mere rasool! aap unhen unke haal par chhor dijiye aur unse alag ho jãiye, unhen anqareeb hi apna anjaam mãloom ho jãega, jaisa ke irshãd farmãya:

قُلۡ يَٰقَوۡمِ ٱعۡمَلُواْ عَلَىٰ مَكَانَتِكُمۡ إِنِّي عَامِلٞۖ فَسَوۡفَ تَعۡلَمُونَ مَن تَكُونُ لَهُۥ عَٰقِبَةُ ٱلدَّارِۚ إِنَّهُۥ لَا يُفۡلِحُ ٱلظَّٰلِمُونَ ١٣٥

Keh de ae meri qaum! tum apni jagah par amal karo, beshak main (bhi) amal karne wãla hoon, to tum anqareeb jaan loge woh kaun hai jiske liye us ghar ka achchha anjaam hota hai. Bilã shuba haqeeqat yeh hai k zãlim log falãh naheen pãte.” [Al-An'am # 6:135]   

 

 

 

 

 

Tafseer Dawat ul Quran (Hindi Translation) Part 8

 أَعـــــــــــــــــــــــوذ بالله من الشيطان الرجيم● 🍂🍃ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍂🍃 📒 तफ़सीर दावतुल क़ुरआन 📒 ✒️ लेख़क: अ...